Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६८ ] [ २३१ शुभभाव छे ते बंधनुं कारण छे. पर जीवनी दयाना भावथी कांई आत्मा जणातो नथी एम अहीं कहे छे. पर जीवनी दया पाळवानो भाव तो राग छे. अने राग छे ए तो आकुळतामय दुःखरूप दशा छे. ज्यारे भगवान आत्मा तो त्रिकाळ निराकुळ आनंदस्वरूप छे, तो आकुळताना भावथी निराकुळ तत्त्व केम प्राप्त थाय? (न थाय). परंतु ए रागना काळे, रागथी भिन्न जे ज्ञाननी पर्याय छे एनाथी आत्मा जणाय एवो छे. अहाहा! ज्ञाननी पर्याय रागने पण जाणे छे छतां ज्ञान ए रागनुं लक्षण नथी. ज्ञाननुं, राग लक्षण नथी अने रागनुं, ज्ञान लक्षण नथी. ज्ञान तो भगवान चैतन्यस्वभावमय आत्मानुं लक्षण छे अने तेणे (ज्ञान पर्याये) जीव तत्त्वने प्रगट कर्युं छे. अहाहा! केवी अजब वात!

प्रश्नः– तो ‘ज्ञानक्रियाभ्याम् मोक्षः’ एम कह्युं छे ने?

उत्तरः– पण भाई! ज्ञानक्रियाभ्याम् एटले शुं? आत्मा जे त्रिकाळ ज्ञानस्वरूप छे एनुं ज्ञान करवुं अने ते ज्ञानमां ठरवुं एनुं नाम ‘ज्ञानक्रियाभ्याम् मोक्षः’ छे. अहीं तो संतो एम जाहेर करे छे के-प्रभो! तुं पोते पोताने ज्ञाननी पर्यायथी जणाय एवुं तारुं स्वरूप छे. लाख वातनी वात के क्रोड वातनी वात आ ज छे. जे ज्ञाननी पर्याय परने जाणवानुं काम करे छे ते कांई परनुं लक्षण नथी. माटे जाणनारी वर्तमान पर्यायने, ते जेनुं लक्षण छे एवा ज्ञायकस्वभावमां वाळ. तेथी तने ज्ञायकनुं स्वरूप व्यंजित एटले प्रगट थशे-जणाशे. आवी वात छे.

अहीं बे वात करी छे. जीवतत्त्वने चैतन्यलक्षणे करीने जाणवुं केमके चैतन्यपणाने जीवनुं लक्षण कह्युं छे अने ते योग्य छे-एक वात; तथा ते लक्षण प्रगट छे-बीजी वात. शुं कह्युं? के जाणवानी जे पर्याय प्रगट छे ते जाणवाना परिणामथी आत्मा जणाय छे अने एनाथी जे जणाय छे ते आत्मा पण प्रगट छे. वर्तमान ज्ञाननी पर्याय जे प्रगट छे ते द्वारा जाणतां ज्ञायक जे शक्तिरूपे छे ते ‘आ प्रगट छे’ एम प्रगट जणाय छे. अहाहा! केटलुं समाव्युं छे! थोडा शब्दोमां ‘गागरमां सागर’ भरी दीधो छे. दिगंबर संतोए-केवळीना केडायतीओए शुं गजब काम कर्यां छे! तेओ जिनेश्वरपद अल्पभवमां ज पामवाना छे.

अहीं कहे छे के-प्रभु! तुं तने रागथी नहीं जाणी शके कारणके राग तारुं स्वरूप नथी. तेम ज तुं अमूर्त छे तोपण, अन्य धर्मास्तिकाय आदि द्रव्यो अमूर्त छे तेथी अमूर्तपणा वडे आत्माने जाणवा जतां अन्य द्रव्यो पण आत्मानी साथे एक थई जशे. ते कारणे अमूर्तपणाथी पण आत्माने परथी भिन्न जाणी शकाशे नहि. मात्र एक चैतन्यलक्षण वडे आत्माने भिन्न पाडी शकाय छे अने ए चैतन्यलक्षण तने प्रगट छे. ते प्रगट लक्षण जीवना स्वरूपने प्रगट करे छे. माटे ए चैतन्यलक्षण जे पर्यायमां प्रगट छे ते वडे आत्माने जाण तो द्रव्य तने व्यंजित एटले प्रगट थशे.