२३२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३
प्रश्नः– परंतु हमणां ते केम जणातो नथी?
उत्तरः– तेने जाणवा माटे जेटली गरज जोईए तेटली गरज कयां छे? जे उपयोगथी ते पकडाय ते उपयोग कयां प्रगट करे छे? स्थूळ उपयोगथी आत्मा पकडातो नथी पण सूक्ष्म उपयोगथी ते पकडाय छे. अज्ञानी उपयोगने सूक्ष्म करतो नथी तेने आत्मा जणातो नथी. न्यायथी वात छे ने! ज्ञायक तरफ ढळेली मति-श्रुतज्ञाननी पर्याय ते सूक्ष्मउपयोग छे. ए सूक्ष्म-उपयोग वडे ज ज्ञायक आत्मा पकडाय छे. अरे! केटलाक तो व्रत-तप करवामां अटकया छे, तो वळी केटलाक देव-गुरु-शास्त्रनी भक्तिमां कल्याण छे एम मानी अटकया छे. बन्नेय एक जातना मिथ्यात्वमां अटकेला छे. तेने कहे छे के भाई! वर्तमान ज्ञानपर्याय, जे लक्षण छे तेने ज्ञायक भणी वाळी दे तो तने आत्मा अवश्य जणाशे.
अहाहा! त्रिलोकीनाथ तीर्थंकरदेवनो आ हुकम छे के तारुं चैतन्यलक्षण तो तने प्रगट छे. प्रभु! जो बिलकुल लक्षण प्रगट ज न होय तो लक्ष्यने पकडवुं मुश्केल पडे. परंतु एम तो नथी. चैतन्यलक्षण तो वर्तमान प्रगट ज छे. माटे प्रगट ज्ञानलक्षण वडे लक्ष्य एवा ज्ञायकने पकड. तेथी ज्ञायकवस्तु जे गुप्त छे ते प्रगट थशे एटले जणाशे. अहाहा! शुं श्लोक छे! आवी वात बीजे कयांय नथी. अहीं लक्षण जे ज्ञाननी पर्याय ते द्वारा लक्ष्य-त्रिकाळी ज्ञायकवस्तुने पकडतां ज्ञायकवस्तु प्रगट थाय छे एटले ज्ञाननी पर्यायमां ज्ञायक आखो आवी जाय छे एम अर्थ नथी; परंतु ज्ञाननी पर्यायमां ज्ञायकवस्तुनुं सामर्थ्य केटलुं छे ते भासे छे. ज्ञायकद्रव्य जो पर्यायमां आवी जाय तो पर्यायना नाशे द्रव्यनो पण नाश थाय, परंतु द्रव्य तो ध्रुव छे, अने पर्याय तो अंश छे. तेथी पर्यायमां आखुं द्रव्य केम आवे? ज्ञायकस्वभाव तरफ ढळेली ज्ञाननी पर्यायमां ज्ञायकनुं सामर्थ्य भासे-जणाय तेने ज्ञायक प्रगट थाय छे एम कहे छे. ज्ञायकवस्तु तो त्रिकाळ जेवी छे तेवी ज छे. पण एनी द्रष्टि करतां ज्ञानपर्यायमां एम भासे छे के वस्तु महाप्रभु आनंदनुं दळ ज्ञायकभावपणे आवी छे. प्रगट पर्याय ज्यां ज्ञायक तरफ वळी त्यां ते प्रगट देखाय छे. आवी वात छे.
अहा! कुंदकुंदाचार्य दिगंबर संत हता. संवत ४९ मां थया हता. अने तेओ त्रिलोकनाथ परमात्मा भगवान सीमंधर प्रभु ज्यां महाविदेहमां बिराजे छे त्यां गया हता. त्यां आठ दिवस रहीने समवसरणमां साक्षात् भगवाननी वाणी सांभळी हती तेम ज श्रुतकेवळी साथे चर्चा करी हती. पछी त्यांथी आवीने आ शास्त्रो बनाव्यां छे. त्यांथी तेओ शुं लाव्या? आ लाव्या के चैतन्यलक्षणे जणाय एवो आत्मा छे. आ देह, वाणीनी जे क्रिया छे ए तो जड छे. माटे एनाथी जीव जणाय नहि. पुण्य-पापना भाव पण जड विपरीतस्वभाववाळा अंधकारमय छे, माटे एनाथी पण जीव जणाय एम नथी, तो