Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६८ ] [ २३३ जीव केम करीने जणाय? तो कहे छे के जीव चैतन्यलक्षणे करीने जणाय छे अने ते चैतन्यलक्षण प्रगट छे.

हवे कहे छे के ते ‘अचलम्’ अचळ छे. ते चैतन्यलक्षण चळाचळतारहित छे अने सदा

मोजूद छे. अहाहा! ते चैतन्यलक्षण स्वमांथी खसीने जडमां के रागमां जाय एवुं नथी, अने ते सदा हयाती धरावे छे, त्रिकाळी ज्ञानलक्षण तो ध्रुव छे. तेने वर्तमान ज्ञानलक्षणथी- ज्ञानपर्यायथी जाणतां जणाय एवो छे, माटे कहे छे. के-हे जगतना जीवो! ‘आलम्ब्यताम्’ तेनुं ज अवलंबन करो. लक्षणनी पर्यायने आलंबन द्रव्यनुं आपो. जेनुं ते लक्षण छे एवा ज्ञायक द्रव्यनुं एने आलंबन आपो. जगतना जीवो ज्ञानलक्षणनुं ज आलंबन करो, केमके ते वडे ज यथार्थ जीवनुं ग्रहण थाय छे.

हे जगतना जीवो, त्रिकाळी शुद्ध चैतन्य भगवाननुं आलंबन लो अने राग अने निमित्तनुं आलंबन छोडो, केमके राग अने परना आलंबनथी कल्याण थतुं नथी. ज्ञाननी पर्याय द्वारा अंदर जतां यथार्थ जीवनुं-ज्ञायकतत्त्वनुं ग्रहण थाय छे माटे एनुं आलंबन लो.

* कळश ४२ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

कहे छे के-वर्णादि भावो जीवमां कदी व्यापता नथी. वर्ण कहेतां रंग अने आदि एटले रागादि भावो. तेओ जीवमां निश्चयथी कदी व्यापता नथी, तेथी तेओ निश्चयथी जीवनां लक्षण छे ज नहि. तेओ एक समयनी पर्यायमां छे, परंतु अंदर द्रव्यमां कयां व्यापे छे? भगवान ज्ञानस्वरूपी आत्मामां रंग अने रागादि कयां छे? माटे तेओ निश्चयथी जीवनां लक्षण छे ज नहि. आ दया, दान, व्रतादिना भाव छे ए तो राग छे, अने राग जीवनुं लक्षण नथी, तेथी ए वडे जीव जणातो नथी. अर्थात् एनाथी सम्यग्दर्शन थतुं नथी.

वर्णादि भाव निश्चयथी जीवमां व्यापता नथी. जो तेओ व्यवहारथी व्यापे छे एम मानवामां आवे तोपण दोष आवे छे. सिद्धोमां तो ते भावो व्यवहारथी पण नथी माटे अव्याप्ति दोष आवे छे. जो वर्णादि भावो जीवना होय तो सदाय जीवमां रहेवा जोईए, परंतु तेओ सिद्ध अवस्थामां व्यवहारे पण होता नथी. माटे तेओ सदाय जीवमां व्यापता नथी, माटे वर्णादि भावोनो आश्रय करवाथी जीवनुं यथार्थ स्वरूप ओळखातुं नथी. अर्थात् रंग, राग आदि भावोनो आश्रय करवाथी जीवस्वरूपनुं सम्यग्ज्ञान थतुं नथी.

हवे कहे छे के अमूर्तपणुं सर्व जीवोमां व्यापे छे. तेथी ‘आत्मा अमूर्त छे’ एम लईए तो? तोपण दोष आवे छे, कारण के धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश