Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२३४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ अने काळ ए चार द्रव्यो पण अमूर्त छे. भगवाने छ द्रव्य जोयां छे. तेमां आत्मा उपरांत धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश अने काळ ए चार द्रव्यो पण अरूपी-अमूर्त जोयां छे. एटले अमूर्तपणुं लक्षण तरीके लेवामां आवे तो, अमूर्तपणुं पोतामां अने अन्य द्रव्योमां पण छे ते कारणे, एना वडे आत्मा जणाय एवो नथी. अमूर्तपणुं जेम जीवमां व्यापे छे तेम अन्य चार द्रव्योमां पण व्यापे छे. तेथी अमूर्तपणुं जीवनुं लक्षण मानतां अतिव्याप्ति नामनो दोष आवे छे. माटे अमूर्तपणानो आश्रय करवाथी पण जीवनुं यथार्थ स्वरूप ग्रहण थतुं नथी.

हवे कहे छे के चैतन्यलक्षण सर्व जीवोमां व्यापतुं होवाथी, एटले के जाणवुं, जाणवुं, जाणवुं-एवुं जे लक्षण छे ते सर्व जीवोमां व्यापतुं होवाथी अव्याप्ति दोषथी रहित छे. कोई वखते ते लक्षण होय अने कोई वखते ते न होय एम नथी. ए सर्व जीवमां सदा व्यापे छे. तथा चैतन्यलक्षण जीव सिवाय अन्य कोई द्रव्यमां व्यापतुं नथी, माटे अतिव्याप्ति दोषथी पण ते रहित छे. तेमज ते चैतन्यलक्षण प्रगट छे. माटे एनो ज आश्रय करवो. वर्णादिभावोनो आश्रय करवाथी यथार्थ स्वरूप ओळखातुं नथी एम नकार कर्यो हतो. हवे अस्तिथी लीधुं के चैतन्यलक्षणनो ज आश्रय करवो केमके ते वडे जीवना यथार्थ स्वरूपनुं ग्रहण थई शके छे.

अहाहा! आत्मा त्रिकाळ ज्ञायकस्वभावी प्रभु छे. ते ज्ञानलक्षण वडे एटले वर्तमान ज्ञाननी पर्याय द्वारा जणाय छे. ज्ञाननी पर्याय ज्ञायक तरफ ढळतां एमां ज्ञायकना स्वरूपनुं यथार्थ ग्रहण थाय छे. अहाहा! केवी वात करी छे! बहारनां व्रत पाळवाथी, भक्ति करवाथी के तप करवाथी आत्मा न जणाय. भाई, ए तो बधो राग छे, ए कांई जीवनुं लक्षण नथी के एनाथी जीव जणाय.

शंकाः– व्यवहारथी पण थाय अने निश्चयथी पण थाय; नहींतर एकांत थई जशे.

समाधानः– भाई! एम नथी. पूर्ण वीतराग न होय त्यां सुधी व्यवहार होय छे, पण ए व्यवहारथी निश्चय पमाय छे एम नथी. सम्यग्ज्ञान अने चारित्रमां अल्पता छे. तेथी साधकने राग-व्यवहार होय छे. पण ते राग साधन छे अने तेथी आत्माने लाभ थाय छे एम नथी. मंदराग पण राग ज छे. मंदरागथी शुं लाभ थाय? पुण्य बंधाय पण तेथी अबंध स्वभाव हाथ आवे नहि. ज्ञायकवस्तु तो ज्ञाननी निर्मळ परिणति वडे ज जणाय छे अने रागथी नहि. आवुं ज स्वरूप छे.

भाई! आ तो जीवन चाल्युं जाय छे. घणा जीवो तो मरीने तिर्यंच थता होय छे. कारण के आर्य मनुष्यने मांस-दारू इत्यादि तो होतां नथी तेथी नरकमां तो न जाय. वळी धर्म तो छे नहि अने जेथी पुण्य बंधाय एवां सत् शास्त्रोनां पठन-पाठन, श्रवण-चिंतवन-मनन इत्यादिनी पण फुरसद मळे नहि, आखो दिवस संसारमां पापनी प्रवृत्तिओ