समयसार गाथा-६८ ] [ २३प करे अने एम ने एम देह छूटी जाय. तेथी भगवान तो एम कहे छे के घणा जीवो अहींथी मरीने पशुमां-ढोरमां अवतरे छे. तिर्यंचनी संख्या पण मोटी छे. भाई! आवां टाणां मळ्यां छे तोपण जो आ न समज्यो अने बहारमां रोकायो तो अवसर चाल्यो जशे. अरेरे! धर्मना नामे पण लोकोने कुधर्म मळ्यो छे!
प्रश्नः– पण अमारे देशनुं भलुं तो करवुं ने?
उत्तरः– भाई! कोण देशनुं भलुं करी शके छे? ‘हुं देशनुं भलुं करी शकुं छुं’ ए मान्यता ज मिथ्या छे. कोनो देश? आ देश कयां तारो छे? ए तो परक्षेत्र छे. तारो देश तो असंख्यातप्रदेशी चैतन्यस्वरूप भगवान आत्मा छे.
त्यारे ते कहे छे-व्यवहारथी तो छे?
भाई! व्यवहार तो कहेवामात्र छे. एनो अर्थ ज ए के ए तारो नथी. लोको मात्र ‘आ मारुं गाम छे’ एम नथी कहेता? (हा, कहे छे). तो शुं ते गाम एमनुं छे? जराय नहि. गाम तो गामनुं छे. तेम भाई! कोना देश अने कोना पादर? प्रभु! ज्यां (भलुं करवानो) राग तारो नथी त्यां देश तारो कयांथी आव्यो? राग छे ए तो उपाधि-संयोगीभाव छे, ते कांई स्वभावभाव नथी, स्वभावभाव तो चैतन्यलक्षण छे.
अहीं आनंदने जीवनुं लक्षण कह्युं नथी केमके ते प्रगट नथी. ज्यारे चैतन्यनी पर्याय तो प्रगट छे तेथी चैतन्यने जीवनुं लक्षण कह्युं छे.
आम तो पंचास्तिकायमां ‘उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य’ लक्षण कह्युं छे. ए तो वस्तुने सिद्ध करवा कह्युं छे. त्यां राग-द्वेष, पुण्य-पापने जीवनुं लक्षण कह्युं छे केमके ते जीवनी पर्यायमां थाय छे एम त्यां सिद्ध करवुं छे. ज्यारे अहीं तो वास्तविक धर्म जेनाथी थाय ए लक्षण छे एम लेवुं छे.
‘उत्पाद-व्यय-ध्रौव्ययुक्तम् सत्’ एम कह्युं छे त्यां विकारी उत्पादने जीवनुं लक्षण कह्युं छे. परंतु ए जुदी चीज छे. ए लक्षण द्वारा तो वस्तुनी स्थिति-मोजूदगी सिद्ध करवी छे. परंतु अहीं तो त्रिकाळी चैतन्यस्वभाव ज्ञाननी पर्यायथी ज जणाय एवो छे, रागथी नहि, माटे ज्ञानने ज एनुं लक्षण कह्युं छे.
हवे आत्मानो जाणक...जाणक...जाणकस्वभाव ज्ञानलक्षण वडे प्रगट छे, अर्थात् ज्ञानलक्षणथी जीव जणाय एवो छे, छतां लोको अज्ञानमां आ लक्षणने केम जाणता नथी? - आम आचार्य आश्चर्य अने खेद प्रगट करे छे. हजी विकल्प छे ने? तेथी आचार्य आश्चर्य अने खेद बतावे छेः-
‘इति लक्षणतः’ आम पूर्वोक्त जुदां लक्षणने लीधे ‘जीवात् अजीवम् विभिन्नम्’