२३६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ जीवथी अजीव भिन्न छे एटले के राग जे अजीव छे तेथी जीव-भगवान आत्मा भिन्न छे. तथा ‘स्वयं उल्लसन्तम्’ तेने (अजीवने) पोतानी मेळे स्वतंत्रपणे जीवथी भिन्न विलसतुं- परिणमतुं ‘ज्ञानीजनः’ ज्ञानी पुरुष ‘अनुभवति’ अनुभवे छे.
शुं कह्युं? के ज्ञानी रागने आत्माना चैतन्यस्वभावथी भिन्न अनुभवे छे. अर्थात् धर्मी जीव ज्ञानस्वभावी आत्माने अनुभवे छे त्यारे, अनुभवमां राग आवतो नथी पण ते भिन्न रही जाय छे, ते भिन्न छे एम जणाय छे. माटे ते राग जीव नथी, अजीव छे. राग एटले देव-गुरु-शास्त्रनी भेदरूप श्रद्धा, शास्त्रना भणतरनो विकल्प, अने पंचमहाव्रतनो भाव इत्यादि. कहे छे के धर्मात्माने ज्ञानलक्षणे लक्षित आत्मानो अनुभव थतां, ते रागने ज्ञानना अनुभवथी भिन्न जाणे छे. धर्मीपुरुष अजीवने पोतानी मेळे स्वतंत्रपणे जीवथी भिन्नपणे परिणमतुं जाणे छे. अनुभव विना राग जुदो छे-जुदो छे एम कोई कहे ए वात नहि. आ तो स्वानुभवनी ज्ञानपरिणतिमां ते राग-अजीव आवतो नथी माटे एने ज्ञानी जुदो जाणे छे एम कहे छे.
दया, दान, व्रत, आदिना विकल्प अजीव केम छे? केमके चैतन्यलक्षणे आत्माने अनुभवतां, ज्ञानना वेदनमां आनंदनुं वेदन जोतां, रागनुं वेदन आवतुं नथी पण ते भिन्न रही जाय छे. माटे ते दया, दान आदिना विकल्प अजीव छे, जीवथी भिन्न छे. हवे कहे छे के आवुं स्वरूप छे ‘तत्’ तोपण ‘अज्ञानिनः’ अज्ञानीने ‘निरवधि–प्रविजृम्भितः अयं मोहः तु’ अमर्यादपणे फेलायेलो आ मोह ‘कथम् नानटीति’ केम नाचे छे? ज्ञान अने राग ए बेना एकपणानी भ्रांति केम नाचे छे? तुं तो ज्ञायकस्वभावी भगवान छो ने! अने आ राग तो अचेतन छे. प्रभु! तने ए बेना एकपणानो भ्रमरूप मोह केम नाचे छे? तने आ शुं थयुं छे? एम कहे छे.
अहा! आत्मा शुद्ध ज्ञानानंदस्वभावी वस्तु छे. ज्ञानलक्षणे तेने अनुभवतां अनुभवथी राग भिन्न रही जाय छे. तेथी राग छे ए तो मडदुं-लाश छे, एमां चैतन्य नथी. आम छे तोपण अज्ञानीने आवुं मडदुं केम नाची रह्युं छे? आ चैतन्यनी साथे मडदाने केम एकमेक कर्युं छे? अरे भाई! जीवती ज्योत् प्रभु चैतन्यमय आत्माने भूलीने आ राग साथे तने एक्ताबुद्धि केम थई छे? ‘अहो बत’ आम आचार्यश्री अमृतचंद्राचार्यने करुणाना भावपूर्वक प्रशस्त खेद अने आश्चर्य थाय छे. कुंदकुंदाचार्य महाराज-दिगंबर संत २००० वर्ष पहेलां थई गया. अने तेमना पछी तेमनी परंपरामां अमृतचंद्राचार्य १००० वर्षे थया. तेओ खेद दर्शावतां आ कळशमां कहे छे के-जेमां चैतन्यपणुं नथी एवा रागादि भावोथी अज्ञानीने एक्तानो मोह- भ्रान्ति केम थई रह्यां छे?
भाई! शुं शास्त्र वांचवाथी ज्ञान थाय छे? ना, वांचवाथी ज्ञान थतुं नथी. जे ज्ञाननी पर्याय थाय छे ए तो एनो जन्मकाळ छे तेथी थाय छे, शब्दोथी थती नथी.