Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६८ ] [ २३७ तथा ए परलक्षी ज्ञान कांई सम्यग्ज्ञान नथी. सम्यग्ज्ञान तो ज्ञानलक्षणे करीने ज्ञायकने अनुभवतां जे ज्ञान थाय छे ते छे. जेवुं स्वरूप ज्ञाननुं छे तेनो नमूनो प्रगटे ते सम्यग्ज्ञान छे. अहा! आत्मा तो विज्ञानघन छे. एमां कोईनो प्रवेश नथी. आ लोढानुं टांकणुं छे ने, एनी अंदर पण अवकाश छे. लोढुं छे छतां एमां थोडो अवकाश-आकाशना प्रदेशो छे. तद्न लोढुं घन-एकमेक नथी. ज्यारे आ भगवान आत्मा तो ज्ञान अने आनंदथी संपूर्ण एकमेक छे. तेमां जराय अवकाश नथी. हीरा, माणेकमां पण अंदर अवकाश-आकाशना प्रदेशो होय छे, पण आ ज्ञानानंदघन प्रभु आत्मामां जराय अवकाश नथी. आवो होवा छतां आचार्य कहे छे के तेने राग सहित मानवारूप निरवधि फेलायेलो मोह-स्वपरनी भ्रान्ति केम नाचे छे? आचार्य पोते धर्मात्मा संत छे अने अल्पकाळमां मोक्ष जवाना छे. पण हजी विकल्प छे ने! तेथी आ आश्चर्य साथे खेद दर्शावे छे के-आ चैतन्यघनस्वरूप आत्मामां रागनो प्रवेश नथी छतां राग साथे एकपणुं मानीने तने आ शुं थयुं छे?

आश्चर्य-मह्द आश्चर्य छे के शुद्ध चैतन्यनुं बिंब प्रभु आत्मा त्रिकाळ ध्रुव अंदर अस्तिपणे बिराजमान छे अने ते ज्ञानलक्षणे करीने जणाय एवो छे छतां एने नहि जाणतां, अरेरे! अज्ञानी राग साथे एकपणुं करीने मोहथी नाचे छे!

वळी, फरी मोहनो प्रतिषेध करे छे अने कहे छे के अज्ञानीनी मान्यतामां स्व-परनी एक्ताबुद्धिथी जो मोह नाचे छे तो नाचो, तोपण भगवान ज्ञायक तो ज्ञायकस्वरूप ज छे. वस्तु तो वस्तुपणे आम ज छेः-

* कळश ४४ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘अस्मिन् अनादिनि महति अविवेक–नाटये’ आ अनादिकाळना मोटा अविवेकना नाटकमां ‘वर्णादिमान् पुद्गलः एव नटति’ वर्णादिमान पुद्गल ज नाचे छे. शुं कहे छे? के राग अने आत्मा एक छे एवी जे मान्यता छे ते अविवेकनुं मोटुं नाटक छे. अविवेकनुं नाटक एटले स्वपरनी एक्तानुं नाटक. चैतन्यब्रह्म प्रभु आत्मा आनंदनो नाथ छे. आवा नाथ साथे रागना एकपणानो भाव ते अविवेकनुं नाटक छे अने एमां पुद्गल ज नाचे छे.

वस्तु तो त्रिकाळ ज्ञायकस्वभावी ज छे. परंतु आ रंग-रागादि भावो, निगोदथी मांडीने पंचेन्द्रिय सुधीना भावो जे छे ते बधायमां पुद्गल ज नाचे छे. भगवान आत्मा तो एक ज्ञायकपणे ज रहे छे. रंग-रागादि भावोमां ए कयां प्रसरे छे? चैतन्यदेव तो सदाय चैतन्यपणे ज रह्यो छे. आ रागादि भावो छे ए तो पुद्गलनो ज नाच छे. तेओ पुद्गलपूर्वक ज थया छे अने तेथी तेमां पुद्गल ज नाचे छे एम कहे छे. अहाहा! अनंतकाळमां जे शुभभाव थयो ए पुद्गलनुं परिणमन छे. अशुभभाव थयो ते पुद्गलनुं परिणमन छे; तथा शुभभावनुं फळ जे स्वर्ग आव्युं ए पण पुद्गलमय छे अने अशुभ-