२३८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ भावनुं फळ जे नरक-तिर्यंच आव्युं ए पण पुद्गलमय छे. आम रागादि भावोमां सर्वत्र पुद्गल ज नाची रह्युं छे.
आत्मा तो जेवो छे तेवो सदाय ज्ञायकपणे छे. प्रवचनसारनी गाथा २००नी टीकामां पण छे के अनादिनो जीव ज्ञायक ज रह्यो छे. आ रागादि भावोमां ए ज्ञायक नाचतो नथी पण पुद्गल ज नाचे छे. आ पुण्य-पापना भाव अने एनां चारगतिरूप फळ तथा शरीर, मन, वाणी, इन्द्रिय इत्यादिनो संयोग-ए बधामां ‘पुद्गलः एव नटति’ पुद्गल ज नाचे छे.
प्रश्नः– रागनी परिणति तो जीवनी छे ने?
उत्तरः– रागनी परिणति जीवनी एक समयनी पर्यायमां छे तेथी तेने व्यवहारथी जीवनी कही छे, तोपण निश्चयथी ते चैतन्यस्वभावमय नथी. रागादिमां चैतन्य प्रसरतुं नथी माटे ते अचेतन पुद्गलमय छे. भाई! जे भावथी तीर्थंकरगोत्र बंधाय ते भाव पण अचेतन- पुद्गल छे केमके ते चैतन्यनी जातिनो नथी. जुओने, आमां शुं लख्युं छे? के अनादिकाळना मोटा अविवेकना नाटकमां वर्णादिमान पुद्गल ज नाचे छे.
जेम नाटकमां पडदा पडे तेम पुण्य-पापना फळरूपे स्वर्गमांथी पशुमां जवुं अने पशुमांथी नरकमां जवुं-एम चारगतिमां परिभ्रमण करवुं ए बधा अनेकरूप पडदामां पुद्गलना ज ठाठ छे, एमां शुद्धचैतन्यमय जीव छे ज नहि. ए तो शुद्ध चैतन्यपणे त्रिकाळ ज्ञायकपणे ज रहे छे, कदीय शुभाशुभभावपणे थतो ज नथी. छठ्ठी गाथानी टीकामां पण आवे छे के भगवान आत्मा शुभाशुभभावना स्वभावे कदीय थयो नथी. जो ते-रूपे थाय तो जड थई जाय केमके शुभाशुभभाव तो जडस्वभावी छे. तेथी कहे छे के पुण्य-पापना भावपणे अने तेना फळपणे पुद्गल ज नाची रह्युं छे. गजब वात छे!
प्रकारनुं देखाय छे, जीव तो अनेक प्रकारनो छे नहि. भगवान आत्मा तो शुद्ध बुद्ध एकस्वभावी अभेदस्वभावी चैतन्यमय छे. अहाहा! सदाय पवित्र चैतन्यस्वभावमय एकरूप वस्तुमां अनेकपणुं नथी. एटले के शुभाशुभभाव अने तेना फळरूप संयोगनुं अनेकपणुं आत्मामां नथी. कहे छे के राजा थाय, रंक थाय, नारकी थाय, देव थाय, तिर्यंच थाय, कीडी, कबुतर के कागडो थाय-ए अनेकपणामां पुद्गलनो नाच छे. एमां सदाय एकरूप चैतन्य कयां प्रसर्यो छे? सत्य समजवुं होय एने आ वात कहे छे. एमां वादविवादथी कांई पार पडे एम नथी.
प्रश्नः– अहीं पुण्य-पाप आदि भावो पुद्गलथी थया छे एम कह्युं छे; तोपण निमित्तथी थया नथी एम आप केम कहो छो?