समयसार गाथा-६८ ] [ २३९
उत्तरः– भाई! ज्यां जे अपेक्षा होय ते बराबर समजवी जोईए. राग पुद्गलनो आश्रय करीने थयो छे तेथी ते पुद्गलनी जातनो छे एम कह्युं छे. राग छे तो जीवनी पर्याय पण ते निमित्तने वशे-वश थवाथी थयेली छे, अने निमित्त तो पुद्गल छे. माटे पुद्गलना वशे थयेला भावने पुद्गलमां नाख्यो छे, केम के ते चैतन्यस्वभावमय नथी. अहीं प्रयोजन त्रिकाळी स्वभावनो आश्रय कराववानुं छे. तेथी विकार थाओ तो थाओ, ए तो पुद्गलमय छे-एम स्वच्छंदपणे न प्रवर्तवुं. राग पोतानी पर्यायमां थाय छे ते अशुद्ध उपादान छे. ए अशुद्ध उपादानने व्यवहार गणीने तथा निमित्त जे कर्म छे तेने पण व्यवहार गणीने-बन्नेने एक गणीने, जीवमांथी काढी नाख्या छे.
अहाहा! आ टीका जे थई छे ए टीकाना शब्दो अने तेनो विकल्प-ए बधुं पुद्गल छे एम कहे छे. ए विकल्पमां सदाय एकरूप ज्ञायकस्वभावी भगवान कयां आव्यो छे? टीका लखवानो विकल्प अने टीकाना शब्दो बन्नेने एक गणीने पुद्गल नाचे छे एम कह्युं छे.
आत्मा ज्ञाताद्रष्टास्वभावी-ज्ञाताद्रष्टाना भावथी परिपूर्ण भाववाळी एकस्वभावी वस्तु छे. ए सिवाय जे अनेक प्रकारे थता पुण्य-पापना विकारी भाव अने एनां फळ-ए बधामां पुद्गल नाचे छे. जो एमां शुद्ध चैतन्य होय तो, अर्थात् जो ते चैतन्यनी जातिना होय तो कदीय नीकळे नहि. पण तेओ तो नीकळी जाय छे. तेथी तेमने अजीव गणीने पुद्गलना कह्या छे, केम के तेओ पुद्गलना विपाकपूर्वक थाय छे. पण तेथी करीने एम न समजवुं के पुद्गलकर्मनो उदय आव्यो माटे विकार थयो छे. कर्म-निमित्तने वश थवाना विपरीत पुरुषार्थथी विकार तो थयो छे, परंतु ते विपरीत पुरुषार्थनी दशा स्वभावमां नथी माटे तेने पुद्गल कह्यो छे.
हवे कहे छे के ‘अयं जीवः’ आ जीव ते ‘रागादि–पुद्गल–विकार–विरुद्ध–शुद्ध चैतन्य–धातुमय–मृर्तिः’ रागादिक पुद्गल-विकारोथी विलक्षण, शुद्ध चैतन्यधातुमय मूर्ति छे. अहाहा! भगवान ज्ञायकस्वरूप तो एकलुं चैतन्यनुं दळ छे. एमां विकल्पनो प्रवेश थाय एवुं पोलाण नथी. दया, दान, व्रत, आदि पुद्गल-विकारो पामे नहि एवी शुद्ध चैतन्यघनस्वरूप मूर्ति छे. ज्ञायक सदा ज्ञायक ज छे.
आत्मामां चिद्विकारने-चैतन्यना विकारोने देखीने एवो भ्रम न करवो के ए पण चैतन्य ज छे. जीवनी पर्यायमां दया, दान, व्रत, भक्ति, आदिना जे परिणाम थाय छे ते चैतन्यना विकार छे. ते चैतन्यमय आत्माना छे एम भ्रम न करवो. एनो अर्थ ए थयो के जे व्यवहार-रागने साधन कह्युं छे ते खरेखर साधन छे एवो भ्रम न करवो. व्यवहार-राग साधन छे ज नहि. व्यवहार कोने कहेवाय? अज्ञानीए तो रागने पोतानो