Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२४० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ मान्यो छे, अने राग तो बंधनुं ज कारण छे; तेथी तेने ए साधन कयांथी थाय? अंतर- स्वरूपनुं जेने भान थयुं छे तेने व्यवहारे व्यवहार छे. (अज्ञानीने तो व्यवहारे पण व्यवहार साधन नथी).

भगवान आत्मा आनंदनो नाथ ज्ञ-स्वभावी-सर्वज्ञस्वभावी प्रभु छे. तेना विरुद्धनो विकार देखीने ते चैतन्यनो छे एम भ्रम न करवो. तथा ते चैतन्यस्वभावनुं साधन छे एम भ्रम न करवो. चैतन्यस्वभावनुं साधन तो तेनो निराकुळ अनुभव करवो ते छे. अहाहा! स्वानुभवनुं कार्य ए चैतन्य परमात्मानुं साधन छे.

प्रश्नः– व्यवहार साधन कह्युं छे ने?

उत्तरः– भाई! एनी स्पष्टता तो पंडितप्रवर श्री टोडरमलजीए मोक्षमार्गप्रकाशकना सातमा अधिकारमां करी छे के-‘हवे मोक्षमार्ग तो बे नथी पण मोक्षमार्गनुं निरूपण बे प्रकारथी छे. ज्यां साचा मोक्षमार्गने मोक्षमार्ग निरूपण कर्यो छे ते निश्चयमोक्षमार्ग छे तथा ज्यां जे मोक्षमार्ग तो नथी परंतु मोक्षमार्गनुं निमित्त छे वा सहचारी छे तेने उपचारथी मोक्षमार्ग कहीए ते व्यवहार मोक्षमार्ग छे, कारण के निश्चय-व्यवहारनुं सर्वत्र एवुं ज लक्षण छे.’

जुओ, जे व्यवहार-मोक्षमार्ग कह्यो छे ते छे तो बंधमार्ग, पण ज्यां आत्माना आश्रये निराकुळ आनंदना अनुभवरूप निश्चय-मोक्षमार्ग-साचो मोक्षमार्ग प्रगटयो छे त्यां, तेने निमित्त देखीने उपचारथी मोक्षमार्ग कह्यो छे. आटली तो स्पष्ट वात करी छे! व्यवहारथी-उपचारथी जे कह्युं छे ते निमित्त आदिनी अपेक्षाए कह्युं छे एम जाणवुं. निश्चय-व्यवहारनुं सर्वत्र आवुं ज लक्षण छे. व्यवहारने जे साधन कह्युं छे ए तो धर्मी-ज्ञानी निजस्वरूपनो ज्यारे उग्र आश्रय ले छे त्यारे जे राग छे ते टळी जाय छे ते अपेक्षाए व्यवहारथी आरोप करीने व्यवहारने परंपरा साधन कह्युं छे. अहीं तो ए सिद्ध करवुं छे के ए राग आत्मानो स्वभाव ज नथी. जुओ, लख्युं छे ने के-‘रागादि चिद्विकारने देखी एवो भ्रम न करवो के ए पण चैतन्य ज छे.’

रागादि चैतन्य ज छे एम न मानवुं, कारण के चैतन्यनी बधी अवस्थाओमां व्यापे- रहे तेने चैतन्यना कहेवाय छे. ज्ञानदशा चैतन्यनी प्रत्येक अवस्थामां व्यापे छे, माटे ज्ञानने चैतन्यनुं स्वरूप अने लक्षण कहेवाय छे. परंतु राग सर्व अवस्थाओमां व्यापतो नथी, माटे राग चैतन्यनुं लक्षण नथी. अरे! अज्ञानीने समक्ति नथी अने तेथी ते व्रत, तप, आदि क्रियाकांडमां साधन माने छे; परंतु भाई! वीतराग-मार्गमां ए (अनीति) न चाले. वीतराग- मार्गमां तो वीतरागी परिणतिथी ज धर्म थाय छे, रागथी नहीं.

अहीं कहे छे के रागादि विकारो जीवनी सर्व अवस्थाओमां व्यापता नथी कारण के