समयसार गाथा-६८ ] [ २४१ मोक्ष-अवस्थामां तेमनो अभाव छे. हवे कहे छे-वळी तेमने अनुभव पण आकुळतामय दुःखरूप छे. जुओ, चैतन्यमां राग नथी एम सिद्ध करवा आ न्याय आप्यो छे. चाहे तो दया, दान, व्रत, भक्ति, तपनो विकल्प हो तो पण ते आकुळतामय दुःखरूप छे. आवी वात कठण पडे पण आ ज सिद्धांत छे. रागनो अनुभव-जे वडे तीर्थंकर-गोत्र बंधाय एवा शुभरागनो अनुभव पण आकुळतामय दुःखरूप छे.
जेने तीर्थंकर गोत्र बंधायुं छे तेनी दशा ज एवी होय छे के ते आगळ वधीने केवळज्ञान पामे छे. तीर्थंकरना जीवनुं समक्ति अप्रतिहत ज होय छे. भले ते कदाच क्षयोपशम भावे होय, तो पण ते समक्ति अप्रतिहत ज होय छे. श्रेणीक राजाने क्षायिक समक्ति छे, परंतु जो कोई त्रीजा नरकमांथी आवे तो तेने क्षयोपशम समक्ति होय छे अने छतां ते पडतुं नथी. हा, त्रीजा नरके जाय छे त्यारे एक क्षण ते पडी जाय छे ए जुदी वात छे. तो पण ए क्षयोपशम समकित क्षायिकपणाने ज प्राप्त करे छे. आवी ज स्थिति तीर्थंकरोनी होय छे. पोताना स्वभावनो उग्र आश्रय लईने तेओ क्षायिक सम्यक्त्वने पामे छे. तीर्थंकरने क्षायिक समकित थवामां श्रुतकेवळी के अन्य तीर्थंकरनुं निमित्त होतुं नथी. ज्यारे अन्य जीवोने क्षायिक समकित थाय त्यारे श्रुतकेवळी के तीर्थंकरनी हाजरी होय छे. तोपण तीर्थंकर के श्रुतकेवळीनी हाजरी छे माटे क्षायिक समकित थाय छे एम नथी, कारण के जो निमित्तथी क्षायिक समकित थतुं होय तो क्षयोपशम-समकिती तो घणा बेठा होय छे, पण ते सर्वने क्षायिक समकित थतुं नथी. जे जीवनी आत्माना उग्र-आश्रय सहित तैयारी होय तेने क्षायिक समकित थाय छे. तेथी निमित्त हो भले पण निमित्तथी समकित पामे छे एम नथी. निमित्त-उपादानना दोहामां पण आ वात लीधी छे.
अहीं एम कहे छे के रागनो अनुभव दुःखरूप छे. जे व्यवहाररत्नत्रयनो अनुभव छे ते दुःखरूप छे. जे दुःखरूप छे ते मोक्षनुं कारण केम थाय? न थाय. मोक्ष तो परमानंदमय पूर्ण दशा छे. माटे तेनुं कारण पण अनाकुळ आनंदमय अनुभवनी दशा छे. रागादिनो अनुभव दुःखरूप छे, माटे तेओ चेतन नथी. तो चैतन्य कोण छे? जे सम्यग्दर्शननुं परिणमन निराकुळ आनंदमय छे ते चैतन्य छे. जुओने! केटली स्पष्टता करी छे! आमां पोतानो आग्रह चाले नहि. सर्वज्ञ परमात्माना मार्गमां तेनी जे रीत होय एम ज जाणवुं जोईए. अरे! पोताना स्वार्थ माटे पोते जेम मान्युं होय तेम अर्थ खोटा करवा ए चाले नहि. अहाहा! परमात्मा महाविदेहमां बिराजे छे. तेमनी वाणी कुंदकुंदाचार्य लाव्या छे. तेमांथी आ शास्त्रो बन्या छे तथा तेना आ अर्थो छे.
अहीं बहु सरस वात लीधी छे. कहे छे के-रागनो अनुभव तो आकुळतामय