२४२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ दुःखरूप छे माटे ते चैतन्य ज नथी. पंचमहाव्रतना परिणाम, दया, दान, व्रत, भक्तिना परिणाम राग छे अने ते दुःखना अनुभवनी दशा छे. माटे ते चेतन नथी पण जड छे. दुःखनो अनुभव छे ते जड छे. अहाहा! केवो न्याय मूकयो छे! देव-गुरु-शास्त्रनी भेदरूप श्रद्धानो के नवतत्त्वनी भेदरूप श्रद्धानो राग छे ते दुःखरूप छे. माटे ते अचेतन छे केमके ते चैतन्यनी जातिमांथी आवतो नथी. व्यवहाररत्नत्रयना भावने पुण्य-पाप-अधिकारमां पापभाव कह्यो छे, केमके अनाकुळ शांतिनो सागर जे आनंदनो नाथ भगवान आत्मा छे एमांथी ते आवतो नथी. अनाकुळ आनंदनो जे अनुभव थाय ते मोक्षमार्ग छे अने ते पूर्ण न थाय त्यां सुधी वच्चे व्यवहाररत्नत्रयनो राग आवे छे, पण ते दुःखरूप छे तेथी जड छे. केवी स्पष्टता छे!
प्रश्नः– परंतु सम्यग्द्रष्टिने दुःखनुं वेदन होय ज नहि एम आवे छे ने?
उत्तरः– अरे, वेदन केम न होय? ज्ञानीने दुःख ज नथी एम मानवुं ए तो एकांत छे. हा, सम्यग्दर्शन अने स्वभावनी वात चाले त्यारे (स्वभावनी द्रष्टिमां) एम कहेवाय के ज्ञानीने दुःखनुं वेदन नथी; पण त्यारे साथे जे ज्ञान छे ते जाणे छे के दुःखनुं वेदन छे. छठ्ठे गुणस्थाने गणधर होय ते पण जेटलो राग छे ते दुःख छे एम जाणे छे. भाई! शुभराग पण दुःखरूप छे, हों. विषयनी वासना, रळवा-कमावाना भाव, के अनुकूळ चीजमां खुशीपणुं अने प्रतिकूळतामां नाखुशीना भाव-ए बधा जे पापभाव छे ए तो तीव्र दुःख ज छे. परंतु अहीं तो कहे छे के रागनी जे मंदतानो भाव-देव गुरु-शास्त्र प्रत्येनो प्रशस्त मंद राग के गुण- गुणीना भेदनो विकल्प-सर्व दुःखरूप छे अने एमां आकुळतानो ज अनुभव छे. भाई! मार्ग तो आवो छे. तेने जेवो छे तेवो मान. अहा! सत्ने सत्नी रीते जो; नहींतर अज्ञानमां रखडपट्टी ज रहेशे.
चैतन्यनो अनुभव निराकुळ छे. कहे छे के परमानंदस्वरूप ज्ञ-स्वभावी-सर्वज्ञस्वभावी भगवान आत्मानो आश्रय लेतां जे ज्ञान-दर्शन-चारित्रनी पर्याय प्रगट थाय छे ते अनाकुळ दशा छे, शांतरसना अनुभवनी दशा छे, अने ते धर्म छे. तथा ते ज जीवनो स्वभाव छे. आ स्वभावपर्यायनी वात छे. भगवान आत्मा अनाकुळ आनंदनी मूर्ति छे. तेनी सन्मुख थईने तेमां एकाग्र थतां जे निराकुळ आनंदनी दशा-उपशमरसनी दशा प्रगट थाय छे ए स्वभावनी दशा छे अने ए धर्म छे. भाई! वस्तुने वस्तु तरीके राख. तेने फेरववा जईश तो सत्य हाथ नहि आवे.
जेम सक्करकंदमां तेना उपरनी लाल छाल सिवायनो आखो साकरनो कंद छे ते मीठाशनो पिंड छे अने तेनी मीठाशनो स्वाद आवे ते सक्करकंद छे. तेम आ आत्मा पुण्य- पापना विकल्पनी छाल सिवायनो आखो अनाकुळ आनंदनो कंद छे. तेना अतीन्द्रिय आनंदनो अनुभव आवे ते आत्मा छे. पुण्य-पापना विकल्प तो छाल जेवा