समयसार गाथा-६८ ] [ २४३ दुःखरूप छे, ते कांई निराकुळ चैतन्य नथी. आ शरीरनां चामडां जुदां छे, जड कर्म जुदां छे अने पुण्य-पापनी छाल पण जुदी छे. एथी भिन्न भगवान आत्मा सच्चिदानंद स्वरूप-सत् कहेतां शाश्वत, चित् एटले ज्ञान अने आनंदस्वरूप छे. तेनो प्रत्यक्ष स्वाद-अनुभव ते मोक्षनो मार्ग छे.
अहा! अहीं तो ‘एक घा ने बे कटका’ जेवी वात छे. कहे छे के व्यवहाररत्नत्रयनो जे भाव छे ते आकुळतामय होवाथी चैतन्य नथी, पण जड अचेतन छे. तेनुं वर्तमान फळ दुःख छे अने भविष्यमां पण ते दुःखनुं ज कारण छे. ७४ मी गाथामां पण आवे छे के शुभभाव वर्तमानमां दुःखरूप छे अने तेथी जे पुण्य बंधाशे तेना कारणे पछी संयोगो मळशे अने ते संयोगो उपर लक्ष जशे तो राग-दुःख ज थशे. अहाहा! वीतरागनी वात गजब छे! वीतराग कहे छे के मारी सामुं जोतां के मारी वाणी सांभळतां, भले तने पुण्यने लईने आवो योग मळ्यो छे तोपण, तने राग ज थशे, दुःख ज थशे. माटे तारामां तुं जो, केम के चैतन्यनो अनुभव निराकुळ छे.
स्वाश्रय छोडीने जेटलो पराश्रयनो भाव छे ते राग छे. अने ते राग दुःखरूप छे. ज्यारे चैतन्यनो अनुभव निराकुळ छे. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रना परिणाम निराकुळ आनंदमय छे.
प्रश्नः– परंतु चारित्र ‘मीणना दांते लोढाना चणा चाववा’ जेवुं कठण छे ने?
उत्तरः– अरे प्रभु! तुं एम न कहे. चारित्रनी आवी व्याख्या न कर. भाई! चारित्र तो आनंददाता छे. अहा! स्वरूपनुं श्रद्धान, एनुं ज्ञान अने एमां शांतिरूप स्थिरता-ए तो अतीन्द्रिय आनंदनां देनार छे. अहा! शुद्ध रत्नत्रयनो अनुभव तो अतीन्द्रिय आनंदनो अनुभव छे. व्यवहारमात्र दुःखरूप छे, ज्यारे भगवान आत्मानो अनुभव आनंदरूप छे. भाई! आ थोडुं लख्युं एमां घणुं जाणजे. बार अंगमां पण आ ज कह्युं छे. आनंदनो सागर प्रभु आत्मा ज्यारे रागथी खसीने स्वभावमां आवे छे त्यारे तेने आनंद ज थाय छे. आवी चारित्रनी दशा आनंदमय छे तोपण तेने जे कष्टदायक माने छे तेने धर्मनी श्रद्धा ज नथी. छहढालामां पण आवे छे के-
‘आतमहित हेतु विराग ज्ञान, ते लखै आपको कष्टदान.’
अज्ञानी त्याग-वैराग्यने दुःखरूप जाणे छे, सुखनां कारणने कष्टदायक जाणे छे.
अहीं तो एम कहे छे के चैतन्यनो अनुभव निराकुळ छे अने ते ज जीवनो स्वभाव छे एम जाणवुं.
हवे, भेदज्ञाननी प्रवृत्ति द्वारा आ ज्ञाताद्रव्य पोते प्रगट थाय छे एम कळशमां महिमा करी अधिकार पूर्ण करे छेः-