Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२४४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३

* कळश ४पः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘इत्थं’ आ प्रमाणे ‘ज्ञान–क्रकच–कलना–पाटनं’ ज्ञानरूपी करवतनो जे वारंवार

अभ्यास तेने ‘नाटयित्वा’ नचावीने, -एटले शुं? के ज्ञाननी एकाग्रतानो-अनुभवनो वारंवार अभ्यास करतां अर्थात् ज्ञानस्वरूप प्रभु आत्मानी एकाग्रतानो अभ्यास वारंवार करतां राग जुदो पडी जाय छे. अभ्यास कहो के अनुभव कहो, बन्ने एक ज चीज छे. आनंदनो नाथ शुद्ध चैतन्यस्वरूप भगवान आत्मा छे. एनी द्रष्टि करी एमां अंतर-एकाग्र थतां राग भिन्न पडी जाय छे, दुःखनी दशा भिन्न पडी जाय छे अने आनंदनी दशा प्रगट थाय छे. ज्ञान ते आत्मा छे एवो एनो अभ्यास-अंतरअनुभव करवो ते ज्ञानरूपी करवत छे.

जेम करवत बे फाड पाडे छे तेम अंतरनो अनुभव ज्ञान अने रागनी बे फाड करी नाखे छे. अहा! आठ-आठ वर्षना बाळको केवळज्ञान लेता हशे ते केवुं हशे? भले आठ वर्षनो राजकुमार होय पण अंतरमां एकाग्रता-अनुभव द्वारा आत्माना आनंदनो स्वाद आव्यो छे ने? ए स्वादनो वारंवार ते अभ्यास करे छे अने एकाग्र-स्थित थई अंतर्मुहूर्तमां परमात्मा थाय छे. आत्मा ज्ञान अने आनंदनी उत्कृष्ट लक्ष्मीनुं निधान त्रिकाळ परमात्मस्वरूप पदार्थ छे. एवा आत्माने रागथी भिन्न पाडीने स्वरूपमां एकाग्र थवानो वारंवार अभ्यास करवो-एम अहीं कहे छे. रागने अने आत्माने पूरा जुदा पाडवा छे ने? एटले कहे छे के ज्ञानरूपी करवतनो वारंवार अभ्यास नचाववो. वारंवार अंतर-अनुभव वडे आनंदना परिणमनमां स्थित थवुं. कयां सुधी? के ‘यावत्’ ज्यां सुधी ‘जीवाजीवौ’ जीव अने अजीव बन्ने ‘स्फुट–विघटनं न एव प्रयातः’ प्रगटपणे जुदा न थाय. आनो भावार्थमां बे रीते अर्थ करशे.

जेम गुलाबनी कळी संकोचरूप होय अने पछी विकासरूप थाय एम भगवान आत्मा जे ज्ञान-दर्शन-आनंदनी शक्तिरूपे छे ते अंदरमां खीले-विकसे छे. मार्ग तो आवो छे, भाई! कोई कथा-वार्ता सांभळीने राजी थाय छे पण ए कांई धर्म नथी. प्रभु! तने तारी मोटपनी खबर नथी. अहाहा! तुं अतीन्द्रिय आनंदनो नाथ सच्चिदानंदस्वरूप भगवान छे. एमां अंतर्मुख थवानो अभ्यास कर. पुण्य-पाप मारां छे एवो अभ्यास तो तें अनादिथी कर्यो छे. पण ए तो दुःखनो अभ्यास छे. हवे आ आनंदना नाथनो अभ्यास कर. कहे छे के-अंदर चिन्मात्रशक्तिरूपे भगवान आत्मा छे तेनो अनुभव ज्यां कर्यो ‘तावत्’ त्यां ‘ज्ञातृद्रव्यं’ ज्ञाताद्रव्य ‘प्रसभ–विकसत्–व्यक्त–चिन्मात्रशक्तया’ अत्यंत विकास पामती पोतानी प्रगट चिन्मात्र-शक्ति वडे ‘विश्वं व्याप्य’ विश्वने व्यापीने, ‘स्वयम्’ पोतानी मेळे ज ‘अतिरसात् उच्चैः चकाशे’ अतिवेगथी उग्रपणे चकाशी नीकळ्‌युं. शुं कह्युं? ज्ञानानंदस्वरूप भगवान आत्मा अनंत शक्तिओथी परिपूर्ण प्रभु छे.