Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६८ ] [ २४प तेनो पूर्ण अनुभव करतां केवळज्ञान थाय छे अने ते आखाय लोकालोकने एक समयमां प्रत्यक्ष जाणे छे. अहीं कहे छे के आवा भगवान आत्मानो ज्यां अनुभव थयो त्यां पर्यायमां चित्शक्तिनी प्रगटता थाय छे. तथा प्रगट थयेल ए ज्ञाननी पर्याय आखा लोकालोकने जाणी शके छे. श्रुतज्ञाननी पर्यायनी पण विश्वने-लोकालोकने जाणवानी ताकात छे. भले ते प्रत्यक्ष न जाणे पण ते पर्यायनुं सामर्थ्य परोक्षपणे लोकालोकने जाणे एवुं विश्वव्यापी छे. अहाहा! स्वानुभव थतां प्रगट थती ज्ञाननी पर्याय लोकालोकने व्यापीने एटले के लोकालोकने जाणती पोतानी मेळे ज अति वेगथी प्रगट थाय छे.

समुद्रमां जेम भरती आवे छे तेम स्वानुभव करतां अंतर चित्शक्तिमांथी पर्यायमां मोटी भरती आवे छे. आवो मार्ग छे. कोईने एम थाय के आवो धर्म!

प्रश्नः– आ कई जातनो धर्म छे? सोनगढथी नवो धर्म काढयो छे?

उत्तरः– भाई! आ नवो धर्म नथी. बापु! आ तो अनादिनो धर्म छे. तें सांभळ्‌यो न होय एटले तने नवो लागे छे. अनादिथी तीर्थंकरो, केवळीओ अने दिगंबर संतो पोकारीने आ ज कहे छे.

प्रश्नः– आ धर्म शुं विदेहक्षेत्रमांथी आव्यो छे?

उत्तरः– ना, आ तो आत्मामांथी आव्यो छे. अहीं कहे छे के चित्शक्तिनो अनुभव करतां ते स्वयं पोतानी मेळे ज अति वेगथी प्रगट थाय छे अने ते जगतने जोरथी उग्रपणे अत्यंत प्रकाशे छे. अर्थात् सम्यग्दर्शनमां प्रकाशे छे अने केवळज्ञान थतां पण ते प्रकाशे छे-एम बे अर्थ छे.

* कळश ४पः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

प्रज्ञा-ब्रह्मस्वरूप प्रभु आत्मा छे. प्रज्ञा कहेतां ज्ञान अने ब्रह्म एटले आनंद. आत्मा ज्ञानानंदस्वरूप पोते ज छे. तेने अज्ञानी बहार गोते छे. परंतु आवा ज्ञानस्वरूप चैतन्य- ब्रह्म-आत्मानो वारंवार अभ्यास करतां चैतन्यस्वरूप छे ते जीव छे अने रागादि अजीव छे- एम जीव अने अजीव बन्नेनो भेद जणाय छे. अने ते काळे तरत ज आत्मानो निर्विकल्प अनुभव थाय छे. आ समक्ति छे.

शुं कह्युं? ज्ञानस्वभावी आनंदघन प्रभु आत्मानो अभ्यास करतां सम्यग्दर्शननी प्राप्ति थाय छे, एटले के कोई बाह्य निमित्तथी के विकल्पथी सम्यदर्शननी प्राप्ति थाय छे एम नथी. भारे वात, भाई! आ वातनो अभ्यास न मळे अने आ वात अत्यारे चालती नथी एटले लोकोने ते नवी लागे छे. अरे! लोको तो व्रत पाळो, उपवास करो, भक्ति करो, दान करो, मंदिर बनावो, रथयात्रा काढो, गजरथ चलावो-इत्यादिमां ज धर्म माने छे. पण बापु! ए कांई धर्म नथी. भाई! साचो गजरथ तो अंदर आनंदना नाथनुं चक्र (परिणति) फेरवे एमां छे. आ ज्ञान अने आनंदथी भरेला भगवानमां