२४६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ एकाग्र थतां जीव अने अजीव जुदा पडी जाय छे अने त्यारे सम्यग्दर्शन थाय छे. कोई व्यवहार करतां करतां सम्यग्दर्शन थाय छे एम नथी.
कहे छे के समकितीनी पर्यायमां विश्वने जाणवानी ताकात छे. चाहे तिर्यंच हो के शरीरथी आठ वर्षनी बालिका हो, परंतु जेने शुद्ध चैतन्यस्वरूप आत्माना अभ्यासथी निर्मळ समकित थयुं छे तेनी श्रुतज्ञाननी पर्यायमां विश्वने जाणवानी ताकात छे. अहा! एक समयनी पर्याय आखाय लोकालोकना समस्त भावोने संक्षेपथी अथवा विस्तारथी जाणे छे. जेनो स्वभाव ज जाणवानो छे ते शुं न जाणे? निश्चयथी विश्वने प्रत्यक्ष जाणवानो जीवनो स्वभाव छे. माटे ज्ञानी विश्वने जाणे छे एम कह्युं छे. श्रुतज्ञाननी पर्यायनो पण, भले परोक्ष जाणे तोपण, लोकालोकने जाणवानो स्वभाव छे.
अरे! अज्ञानीने अंदर आत्मा केवडो मोटो छे एनी खबर नथी. अने तेथी ते पोताने एक समयनी पर्याय जेवेडो रागादिवाळो पामर माने छे. आम मानीने तेणे पूर्णानंदना स्वभावनो अनादर कर्यो छे. अर्थात् पूर्णानंदना स्वभावनी जे हयाती छे एनो तेणे नकार कर्यो छे अने राग अने पुण्यनी हयातीनो स्वीकार कर्यो छे. अहीं कहे छे के ज्ञानस्वरूप भगवान आत्मानुं अंतरमां वलण करी तेनो अभ्यास करतां रागथी ज्ञान भिन्न पडे छे अने त्यारे सम्यग्दर्शन थाय छे. तेनी साथे थतुं ज्ञान विश्वना नाथने (आत्माने) जाणे छे. तथा जेणे पर्यायमां विश्वना नाथने जाण्यो छे तेने-ते पर्यायने लोकालोकने जाणवामां शुं मुश्केली पडे? जे ज्ञाननी पर्यायमां ‘विश्वनाथ’-आत्मा जणायो ते पर्याय विश्वने जाणे ज एमां प्रश्न शुं? (एमां नवाई शी?) एम अहीं कहे छे भाई! जिनवाणी अमूल्यवाणी छे अने तेनो रस मीठो छे. पण ए तो जेने वाणीनुं भान थाय एने माटे छे.-आम एक आशय छे.
बीजो आशय आ प्रमाणे छेः जीव-अजीवनो अनादिथी जे संयोग छे ते केवळ जुदा पडया पहेलां अर्थात् जीव अने अजीव तद्न जुदा थाय ते पहेलां-मोक्ष थया पहेलां भेदज्ञान भावतां वीतरागता रहित जे दशा हती ते हवे वीतरागता सहित दशा थई. एटले के अंतरमां स्वभावनी एकाग्रता थतां निर्विकल्प धारा जामी-वीतरागतानी धारा अंदर परिणमी के जेमां केवळ आत्मानो अनुभव रहे छे. अने ते अंतर-एकाग्रतानी धारा वेगथी आगळ वधतां वधतां केवळज्ञान प्रगट थाय छे. पछी अघाती कर्मोनो नाश थतां जीवद्रव्य अजीवथी तद्न भिन्न पडी जाय छे. पहेला आशयमां सम्यग्दर्शन सुधीनी वात करी हती, अहीं बीजा आशयमां सम्यग्दर्शन पछी धारा वेगथी आगळ वधतां परिपूर्ण आनंद अने ज्ञान थाय छे अने त्यारे जीव अने अजीव तद्न जुदा पडी जाय छे एनी वात छे. जीव अने अजीवने भिन्न करवानी आ रीत-पद्धति छे. निर्मळ शुद्ध चैतन्यस्वभावमां एकाग्रतानो अभ्यास करवो ते अजीवथी जुदा पडवानी रीत अने मार्ग छे. रागने साथे