समयसार गाथा-६८ ] [ २४७ लईने के रागनी मददथी जीव-अजीव जुदा न थाय. भाई! जेने जुदो पाडवो होय तेनी मदद जुदा पाडवामां केम होय? राग तो अजीव छे अने तेने तो चैतन्यथी जुदो पाडवो छे. तो रागनी सहायथी राग जुदो केम पडे? न पडे. बहु झीणी वात!
-आ प्रमाणे जीव-अजीव जुदा जुदा थईने रंगभूमिमांथी बहार नीकळी गया. अर्थात् जीव जीवरूपे थई गयो अने अजीव अजीवरूपे थई गयुं.
जीव अने रागादिक जे अजीव छे ते बन्नेनी अहीं वात छे. जेम नाटकमां नट स्वांग लईने आवे छे तेम ज्ञायकस्वभावी चैतन्यस्वरूप जीव अने अजीव रागनुं रूप धारण करीने अखाडामां प्रवेश करे छे. ए बन्नेए एकपणानो स्वांग रच्यो छे. आत्माए रागनो स्वांग रच्यो छे अने राग जाणे के आत्मा होय एवो स्वांग रच्यो छे, परंतु भेदज्ञानी सम्यग्द्रष्टि पुरुष भेदज्ञान-सम्यग्ज्ञान वडे ते जीव अने अजीवने, तेमना लक्षणभेदथी परीक्षा करीने, बन्नेने जुदा जाणे छे. आत्मानुं लक्षण चैतन्य छे, ज्यारे राग-व्यवहाररत्नत्रयनो राग पण अचेतन छे. आम बन्नेना भिन्न लक्षणो वडे तेमने भिन्न वस्तुओ तरीके धर्मी जाणे छे. धर्मीजीव बन्नेनी लक्षणभेदथी परीक्षा करे छे के-आ जाणनार ते हुं आत्मा अने आ अनुभवथी भिन्न रहेतो अचेतन राग ते हुं नहि. आम बन्नेने ज्यां जुदा जाणी लीधा त्यां स्वांग पूरो थाय छे, अने बन्ने जुदा जुदा थईने रंगभूमिमांथी बहार नीकळी जाय छे. एटले के आत्मा आत्मामां आनंदरूपे रहे छे अने राग, रागरूपे रही नीकळी जाय छे. आ प्रमाणे अलंकार करीने वर्णन कर्युं छे.
हवे टूंकमां कहे छे के-आ जीव अने अजीवनो अनादिथी संयोग छे. परंतु जेनी द्रष्टि संयोगी छे ते अज्ञानी, संयोगीभाव पोताना छे एम मानीने भिन्न आत्माना चैतन्यस्वरूपने पामतो नथी. पण ज्यारे भेदज्ञान-सम्यग्ज्ञान थाय छे त्यारे ज्ञानी, ज्ञान पोतानुं लक्षण छे एम जाणी रागने जुदो पाडे छे. निज स्वभाव तो ज्ञानानंदस्वरूप छे अने ते हुं छुं, आ रागादिभाव ते हुं नहि-एम ज्ञानलक्षणथी ज्ञायकने पकडतां राग भिन्न पडी जाय छे अने आत्माना आनंदनो अनुभव थाय छे. अहाहा! सद्गुरुनो उपदेश सांभळी सारो दिवस पामतां (काळलब्धि पाक्तां) अज्ञान दूर थाय छे अने त्यारे जगतमां महंत-महात्मा कहेवाय छे अने मोक्ष प्राप्त करीने सदाय निज आनंदरूपे रहे छे.
अहीं सद्गुरुनो उपदेश सांभळतां अज्ञान दूर थाय छे एम कह्युं एमां निमित्तनुं ज्ञान कराव्युं छे एम समजवुं. पण निमित्त-उपदेशथी ज्ञान थयुं छे एम न जाणवुं. कोई द्रव्यनी पर्याय कोई अन्यद्रव्य वडे नीपजे छे एम त्रणकाळमां नथी. गाथा ३०८ थी ३११ नी टीकामां आवे छे के-‘सर्व द्रव्योने अन्य द्रव्य साथे उत्पाद्य-उत्पादकभावनो अभाव छे.’ वळी गाथा ३७२नी टीकामां लीधुं छे के-‘वळी जीवने परद्रव्य रागादिक उपजावे छे एम शंका न करवी; कारण के अन्यद्रव्य वडे अन्यद्रव्यना गुणनो (पर्यायनो)