२प० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ मंदता, देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धानो राग छे तेने व्यवहार समकित कहेवामां आवे छे. परंतु व्यवहारथी निश्चय थाय छे एम त्रणकाळमां नथी. तेवी रीते निमित्तथी उपादानमां कार्य थाय एम पण त्रणकाळमां बनतुं नथी. निश्चय (उपादान) होय त्यारे व्यवहार (निमित्त) होय भले, परंतु निमित्तथी कार्य नीपजतुं नथी. गाथा ३७२मां आवे छे के ‘सर्व द्रव्यो ज निमित्तभूत अन्यद्रव्योना स्वभावने नहि स्पर्शतां थकां....’ शुं कहे छे? कोई पण द्रव्य निमित्तभूत अन्यद्रव्योना स्वभावने अडतां नथी. एटले माटीमांथी घडो थाय छे पण ते माटी कुंभारने अडती नथी. अहाहा! ज्यारे चोखा पाके छे त्यारे तेने अग्नि अडती ज नथी. पाणीने अग्नि अडती नथी अने पाणी गरम थाय छे. गजब वात छे!
प्रश्नः– परंतु सम्यग्दर्शन निसर्गज अने अधिगमज एम बे प्रकारे कह्युं छे ने?
उत्तरः– भाई! अधिगमज सम्यग्दर्शन पण थयुं छे तो पोताथी ज, परंतु निमित्तनी त्यारे उपस्थिति होय छे तेथी एनाथी सम्यग्दर्शन थयुं छे एम कहेवाय छे. निमित्तथी सम्यग्दर्शननी उत्पत्ति थाय छे एम त्रणकाळमां नथी. निमित्त कार्यने उत्पन्न करे के निमित्तमां कार्य उत्पन्न कराववानी ताकात छे के उत्पन्न थनारी पर्याय निमित्तनी अपेक्षा राखीने उत्पन्न थाय छे एम छे ज नहि. गाथा ३०८ थी ३११ अने गाथा ३७२ मां आ ज वात करेली छे.
‘श्रीगुरुके उपदेश सुनै रु भले दिन पाय अज्ञान गमावै’ एम जे कह्युं छे ए तो निमित्तथी कथन कर्युं छे, बाकी अज्ञान तो पोते स्वना आश्रये ज गमावै-नाश करे छे. माटे व्यवहारथी निश्चय न थाय अने निमित्तथी परमां उत्पाद न थाय एम यथार्थ नक्की करवुं. खरेखर तो द्रव्य पर्यायने करे छे ए पण पर्यायार्थिक नयथी कथन छे एम जाणवुं. माटीथी घडो थयो छे एम कहेवामां ए परथी थयो नथी एम बताववुं छे. बाकी ध्रुव माटी घडानी पर्यायने करे नहीं. अहाहा! भगवान ध्रुव आत्मा (निश्चयथी) पर्यायने अडतो नथी, अने पर्यायने करतो पण नथी. लोटमांथी रोटली थाय छे त्यारे वेलणथी गोरणुं लांबु थाय छे एम त्रणकाळमां नथी, कारण के वलणने लोट अडतो ज नथी अने वेलण गोरणाने अडतुं ज नथी. तेवी रीते ज्यारे निश्चय अने व्यवहार एक साथे प्रगटे छे त्यारे व्यवहारने निश्चय अडयो ज नथी. अहाहा! निर्मळ पर्याय रागने अडती ज नथी. भाई! भगवान सर्वज्ञदेवे कहेलुं सत्य तो आवुं छे. तेने ते रीते समजवुं जोईए.
व्यवहार आवे छे, होय छे. तेनी आववानी योग्यता होय त्यारे ते आवे छे, परंतु एनाथी निश्चय प्रगटे छे एम नथी.
प्रश्नः– सांभळवाथी तो ज्ञान थाय ने?
उत्तरः– भाई! भाषा तो जड छे, एनाथी ज्ञान केम थाय? सांभळवाथी कांई