Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६८ ] [ २प१ ज्ञान थतुं नथी. वाणीनी पर्याय उत्पादक अने ज्ञान उत्पाद्य एम छे ज नहि. ए तो पोतपोताना काळे अने पोतपोताना कारणे ज्ञाननी तथा वाणीनी पर्याय थई छे, एकबीजाना कारणे थई छे एम नथी. भाई! वीतराग सर्वज्ञनो मार्ग बहु झीणो अने हितकारी छे. श्रीमद् राजचन्द्रे पण कह्युं छे के-

‘सर्वज्ञनो धर्म सुशर्ण जाणी, आराध्य आराध्य प्रभाव आणी,
अनाथ एकांत सनाथ थाशे, एना विना कांई न बाह्य स्हाशे.’

भाई! वीतरागनी वाणी एम पोकारे छे के-अमे संभळावीए छीए माटे तने ज्ञान थाय छे एम नथी, कारण के बीजा द्रव्यनी पर्यायथी बीजा द्रव्यनी पर्यायनो उत्पाद थाय एम छे ज नहि. बे द्रव्यो वच्चे उत्पाद्य-उपादक संबंध छे ज नहि. वस्तु स्वतंत्र छे, तेथी जे समये तेनो जे पर्याय थाय छे ते तेनो जन्मक्षण-निजक्षण छे. ते समये पर्यायनी उत्पत्तिनो काळ छे तेथी ते पोताथी ज थाय छे, निमित्तथी नहि. आवी वात छे. अज्ञानी साथे तो वाते वाते फेर छे. पण भाई! मार्ग तो आ ज छे. नियमसारमां आवे छे के-आवा सुंदर मार्गनी जो कोई अज्ञानी निंदा करे तो तेथी तुं मार्गनी अभक्ति न करीश. अज्ञानीओ निंदा करे एथी तारे शुं? तुं स्वरूपनी भक्ति छोडीने अभक्ति न करीश.

चैतन्यस्वरूप भगवान आत्मा पोताना आश्रये अंदरमां ज्यारे सम्यग्दर्शन-ज्ञाननी पर्याय उत्पन्न करे छे त्यारे ते धर्मनी उत्पत्ति थवानी प्रथम क्षण छे. हवे ते वखते राग- व्यवहार हतो माटे धर्मनी उत्पत्ति थई छे एम नथी. व्यवहार-रागनी उपस्थिति भले होय, पण एनाथी धर्मनी परणिति थई नथी. बे मोक्षमार्ग ध्यानमां प्रगट थाय छे एनो अर्थ शुं? के आनंदना नाथ भगवान चैतन्यदेवने जेणे अंदरमां पकडयो छे-अनुभव्यो छे ते निर्मळ परिणति निश्चय मोक्षमार्ग छे अने ते वखते जे राग बाकी छे तेनो आरोप आपीने व्यवहार मोक्षमार्ग कह्यो छे. खरेखर तो जे राग छे ते बंधनुं कारण छे, पण स्वाश्रये प्रगटेली निश्चय श्रद्धा-ज्ञान-चारित्रनी निर्मळ परिणति साथे जे रागनी मंदतानी हाजरी छे तेने उपचारथी मोक्षमार्ग कहेलो छे. व्यवहार समक्ति ए कांई समक्ति नथी, कारण के ते श्रद्धा-सम्यक्त्व गुणनी पर्याय नथी. ए तो रागनी पर्याय छे अने निश्चय साथे देखीने तेमां (व्यवहार) समक्तिनो उपचार कर्यो छे.

प्रभु! तारी मोटप पार विनानी अपार छे. तारी मोटप प्रगट करवा माटे रागनी हीणी दशाना आलंबननी तने जरूर नथी. ए (धर्मनी) पर्याय तो निमित्तनी अपेक्षा राख्या विना प्रगट थाय छे. (जुओ, गाथा ३०८ थी ३११). अहाहा! व्यवहारनी अपेक्षा राख्या विना ज पोताना स्वभावनी उत्पत्ति पोताने लईने स्वकाळे स्वाश्रित पुरुषार्थ द्वारा थाय छे. भाई! आ वातने बराबर राखीने पछी जोडे जे निमित्त-राग छे तेने