Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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४२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ दीधी छे. पर्यायमां जे राग थाय एनुं कारण अने कार्य स्वयं राग छे, आत्मा नहि अने कर्म पण नहि ज नहि. राग थाय एमां आत्मा निमित्त छे एम योगसारमां आव्युं छे. राग थाय एमां आत्मा निमित्त छे, उपादान नहि. विकार विकारना कारणे स्वयं थाय एमां ज्ञायकमूर्ति प्रभु आत्मा निमित्त छे. निमित्त छे एटले के छे, बस एटलुं ज; एनाथी थयो एम नहि. अहो! दिगंबर संतोए गजबनां काम कर्यां छे. माटे भगवान आत्मा दुःखनुं अकारण ज छे.

आस्रवो-पुण्यपापना भावो अशुचि छे, भगवान आत्मा अत्यंत शुचि छे ए पहेलो बोल थयो. आस्रवो-पुण्यपापना भावो जड, अचेतन छे, अने भगवान आत्मा विज्ञानघनस्वभाव होवाथी चेतक छे, शुद्ध चैतन्यमय छे. आ बीजो बोल कह्यो. आस्रवो- पुण्यपापना भावो आकुळता उपजावनारा होवाथी दुःखनां कारण छे, अने भगवान आत्मा सदाय अनाकुळस्वभाव होवाथी दुःखनुं अकारण ज छे. आ त्रीजो बोल कह्यो. त्रण बोलथी आत्मा अने आस्रवोनी भिन्नता कही. आ प्रमाणे आस्रवोथी भिन्न अने स्वभावथी अभिन्न एवा आत्मानी सन्मुख थईने भेदज्ञान प्रगट करवुं, अर्थात् पर्यायने त्रिकाळीमां अभेद करवी ते धर्म छे-मोक्षमार्ग छे. पर्यायने अभेद करवी एटले द्रव्य-सन्मुख करवी एवो एनो अर्थ छे. कांई द्रव्य अने पर्याय एक थई जाय एम अर्थ नथी. पर्याय द्रव्यसन्मुख थतां स्वभावनी जातनी पर्याय थई अने रागथी भिन्न पडी गई. एटले ते द्रव्यथी अभिन्न थई एम कहेवामां आवे छे.

पाठमां ‘णादूण’ शब्द पडयो छे ने? एनो अर्थ ए के आस्रवोने अशुचि, अचेतन अने दुःखनां कारण जाणीने एनो विशेष खुलासो एम छे के अत्यंत शुचि-पवित्र, चैतन्यस्वभावमय, सहजानंदमूर्ति भगवान आत्मा ज्यां अनुभवमां-ज्ञानमां आव्यो त्यां आस्रवो अशुचि आदि पणे जणाई गया, निर्मळ भेदज्ञान थई गयुं. ए ज धर्म अने मोक्षमार्ग छे. स्वतरफ वळतां ज्यां शुद्ध आत्मा जणायो त्यां आस्रवो अशुचि इत्यादि छे, निज स्वरूपथी भिन्न छे एम भेदज्ञान थई जाय छे अने आत्मा आस्रवोथी निवृत्त थाय छे.

जुओ! आ कर्ताकर्म अधिकार चाले छे. कर्ता एटले थनारो. आत्मा खरेखर पोताना चैतन्यस्वभावे थनारो छे. ज्ञाता-द्रष्टाना जे निर्मळ परिणाम थाय ते एनुं कर्म छे अने तेनो कर्ता आत्मा छे. अहाहा...! आत्मा सहजानंदनी मूर्ति त्रिकाळी भगवान छे. ते दुःखनुं कारणेय नहि अने दुःखनुं कार्य पण नहि; ते रागनुं कारण पण नहि अने कार्य पण नहि. पुण्य-पापना भाव आवे खरा, पण ते आत्मानुं कार्य नहि.

प्रश्नः- तो मंदिर बनाववा अने प्रतिष्ठा कराववाना भाव आवे छे ने?

उत्तरः– हा, आवे छे; पण ते छे राग. भाई? भगवाननी मूर्ति छे, मंदिर