समयसार गाथा ७२ ] [ ४३ पण छे. ए बधुं छे ए आगमथी सिद्ध छे, इतिहासथी पण सिद्ध छे. कोई एने उथापे तो ए मार्ग नथी. मोहन-जो-डेरोमां पांच हजार वर्ष जूनी प्रतिमा नीकळी छे, इतिहासथी पण ए सिद्ध छे, शास्त्रमां पण मूर्तिनी वात छे. माटे एनो कोई निषेध करे तो ते सत्य मार्ग नथी. भगवाननी मूर्ति छे अने जे शुभभाव करे तेने एमां ते निमित्त पण छे. भगवाननी प्रतिमा शुभभाव करावी दे एम नहि, पण जे शुभभाव करे तेने ए निमित्त छे. तथापि शुभभाव छे ते धर्म नथी, धर्मनुं कारण पण नथी. आवी चोकखी वात छे.
वळी कोई मूर्ति माने, पण तेमां आडंबर वधारी तेने शणगार-आभूषण लगावे तो ते पण बराबर नथी, सत्य मार्ग नथी. शुद्ध जळथी ज भगवाननो अभिषेक होय एवी शास्त्रोक्त पद्धति छे. एमां फेरफार करवो ए पण मार्ग नथी. भाई! आ तो वीतरागनो मार्ग छे. तेमां वीतरागी बिंबनुं ज स्थापन, पूजा, भक्ति होय छे.
वीजळीना दीवाना मोटा भपका करे एमां जीव-जंतु मरे, पतंगियां मरे. जेमां विशेष हिंसानो दोष थाय ए मार्ग नथी. भाई! आ तो विवेकनो मार्ग छे. भगवानने फूल चढावे अने केशरना चांल्ला करे ए मार्ग नथी. कोई प्रतिमाने (जिनबिंबने) उथापे तो ए मार्ग नथी अने कोई प्रतिमा पर आभूषणादि अनेक प्रकारे आडंबर रचे तो ते पण मार्ग नथी. भगवाननी मूर्ति होय छे. तेनी पूजा-भक्ति-वंदनाना भाव पण होय छे. पण एनी मर्यादा एटली के ते शुभभाव छे, पुण्यबंधनुं कारण छे. कह्युं ने अहीं के ते आकुळता उपजावनार दुःखनुं कारण छे.
संप्रदायमां हता त्यारे चोटीलामां एक साधु साथे चर्चा थयेली. एमणे कबुल करेलुं के भगवाननी मूर्तिनी वात शास्त्रमां छे. वात साची छे. पण वात बहार केम मूकाय? लोकोने श्रद्धा उडी जाय. भाई! परमात्मा त्रणकाळ त्रणलोकना जाणनारा अनादिथी छे. तेम जिनबिंबनी-प्रतिमानी स्थापना, मंदिरोनुं निर्माण, तेमनी पूजा-भक्ति-वंदना-अभिषेक बधुं अनादि काळथी छे. स्वर्गमां तो भगवाननी शाश्वत अकृत्रिम प्रतिमाओ छे. इन्द्रो, देवो, देवांगनाओ तेनां वंदन-पूजन आदि करे छे अने मोटा महोत्सवो उजवे छे.
परंतु ए बधो भाव शुभ छे. एनाथी पुण्यबंधन थाय एटली एनी मर्यादा छे. एथी आगळ जईने जो कोई एम कहे के एनाथी (शुभथी) संसार परित थाय तो ए वात साची नथी. २प०० वर्ष पहेलांनी तथा पांच हजार वर्ष पहेलांनी पुराणी प्रतिमाओ नीकळी छे. छापामां एना लेख आवे छे ए परथी प्राचीन काळमां पण ए परंपरा प्रचलित हती एम सिद्ध थाय छे.
धवलमां तो एम आवे छे के जिनबिंबदर्शनथी निधत्त अने निकाचित कर्मना