Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 817 of 4199

 

समयसार गाथा ७२ ] [ ४प शुभभाव अने मंदिर कांई आत्मानुं कार्य नथी. अहाहा...! भगवान आत्मा निराकुळ आनंदनो नाथ आनंदरसकंद प्रभु छे, तेनी पर्यायमां आनंदनुं कार्य थाय एनो ए कर्ता छे अने जे आनंद प्रगटयो ए तेनुं कार्य छे. परंतु व्यवहाररत्नत्रयना जे शुभ-भाव थाय तेनुं आत्मा कारण पण नथी अने कार्य पण नथी. शुभभावरूपी जे दुःख तेनुं आत्मा कारण केम होय? (न होय). शुभभावरूप जे दुःख छे ते कारण अने आनंदनी पर्याय एनुं कार्य केम होई शके? (न होई शके). अहा! कोईनुं कार्य तेम ज कोईनुं कारण नहि होवाथी भगवान आत्मा दुःखनुं अकारण ज छे.

द्रष्टि अने द्रष्टिनो विषय जे त्रिकाळी द्रव्य छे तेमां एवी कोई शक्ति नथी जे विकारने करे. तथा ते शक्तिवान अखंड द्रव्यने द्रष्टिमां लेनार (ज्ञानी) स्वभावपरिणमननो कर्ता छे, पण विभावनो नहि.

त्यारे कोई वळी एम कहे छे के राग उत्पन्न थाय छे एमां बे कारण जोईए-जेम माता-पिता बेथी पुत्रनी उत्पत्ति थाय छे तेम. हा, जयसेनाचार्यनी टीकामां आवुं कथन आवे छे, पण त्यां कयी अपेक्षाथी कह्युं छे ते समजवुं जोईए. खरेखर रागनो कर्ता आत्मा नथी, पण पर्यायमां परिणमन छे ए अपेक्षाए तेने कर्ता कह्यो छे. त्यां निश्चय राखीने वात छे, तथा प्रमाणनुं ज्ञान कराववा निमित्तने भेळवीने कह्युं के ए (निमित्त) कर्ता छे. आ प्रमाणे कार्यना बे कारणो सिद्ध कर्या छे-एक उपचरित अथवा निमित्त कारण अने एक उपादान कारण. उपादान कारण छे ते यथार्थ छे अने उपचरित कारण अयथार्थ छे. रागनो जे विकल्प उठे छे तेनुं निश्चयथी आत्मा कारण नथी. पण पर्यायमां थाय छे तेथी तेने कारण गण्युं छे. खरेखर तो रागनुं कारण रागनी पर्याय पोते ज छे. राग आत्माना द्रव्य-गुणनुं कारण नथी, तथा द्रव्य-गुण रागनुं कारण नथी.

शुभरागनो भाव ज्ञानीने आवे, मुनिराजने पण आवे छे, परंतु तेओ एना कर्ता थता नथी. भागचंदजीनी स्तुतिमां आवे छे के मुनिवरोने अशुभभावनो तो विनाश थई गयो छे अने शुभभावथी तेओ उदास छे. अहो! धन्य ते मुनिवरो भावलिंगी दिगंबर संतो जंगलवासी वीतरागभावमां झूलनारा केवलीना केडायतो! अहा! तेमने अशुभ-भावनी तो गंधेय नथी अने जे शुभोपयोग होय छे तेनाथी तेओ उदास छे. अहा! शुं तेमनां वचनो! उपदेश आपता होय त्यारे जाणे तेमना मुखमांथी अमृतनां झरणां झरतां होय! परंतु अहीं कहे छे के ए वचनामृतनुं कारण (मुनिवरनो) आत्मा नहि. आत्मा कोईनुं कारण नथी तेम ज कोईनुं कार्य पण नथी. अहाहा! दर्शनबुद्धिनी कांई बलिहारी छे! चारित्र दोष भले होय, उदयवश रागमां भले जोडाय, परंतु दर्शनशुद्धिनी निर्मळतामां रागनुं हुं कारण नहि अने राग मारुं कार्य नहि-एम धर्मी जीव माने छे. दर्शनशुद्धिना बळे हुं तो जाणनार-जाणनार- जाणनार ज्ञाता-द्रष्टा छुं एवी द्रष्टि