Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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४६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ निरंतर रहे छे. आवी दर्शनशुद्धि अने एनो विषय मूळ चीज छे. दर्शनशुद्धि प्रगट थई एने तो जन्म-मरणनो अंत आवी गयो.

राग अने स्वभावनी एक्ताबुद्धिनी ग्रंथि-गांठ ए तो मिथ्यात्व छे. हुं तो शुद्ध चैतन्यमूर्ति भगवान छुं एवा भानमां धर्मी जीवने रागनी द्रष्टि खसी गई छे. राग मारा स्वरूपमां नथी एम रागने ए पोताना ज्ञानमां परज्ञेय तरीके जाणे छे. राग छे माटे जाणे छे एम पण नथी. ए तो ज्ञाननी पर्याय स्वपर-प्रकाशक पोताना ज सामर्थ्यथी छे ते स्वपरने जाणती प्रगट थाय छे. आवी भेदज्ञाननी वात बहु झीणी, भाई!

हवे कहे छे-‘आ प्रमाणे विशेष (तफावत) देखीने ज्यारे आ आत्मा, आत्मा अने आस्रवोनो भेद जाणे छे ते ज वखते क्रोधादि आस्रवोथी निवृत्त थाय छे.’ भगवान आत्मा अतिनिर्मळ चिदानंदस्वरूप छे अने आस्रवो मेला दुःखरूप छे एम बे वच्चेनो तफावत- स्वभावभेद जे वखते जाणे छे ते ज वखते क्रोधादि आस्रवोथी ते निवृत्त थाय छे एटले के पुण्य-पापना भाव मारा छे एवा अभिप्रायथी निवृत थई जाय छे. जुओ! धर्मसभामां गणधरो अने एकावतारी इन्द्रो जे वात सांभळता हता ते आ अलौकिक वात छे. बापु! मुनिवरोनी वाणी ए तो सर्वज्ञनी वाणी छे. कहे छे-जे वखते रागथी भिन्न अंदर चिदानंद भगवान जाण्यो ते ज वखते रागथी-आस्रवथी निवृत्त थई गयो. रागभाव अने स्वभावभावनुं भेदज्ञान थतां ज रागमांथी द्रष्टि खसी जाय छे, निवृत्त थाय छे.

‘कारण के तेमनाथी जे निवर्ततो न होय तेने आत्मा अने आस्रवोना पारमार्थिक (साचा) भेदज्ञाननी सिद्धि ज थई नथी.’ तेने साचुं भेदज्ञान थयुं ज नथी.

जुओ! अशुभभावथी तो ठीक, पण शुभभावथी आत्मा भिन्न छे ए वात अज्ञानीने खटके छे. पण अहीं कहे छे के शुभभाव अने आत्मा-बे भिन्न छे एम जे काळे जाण्युं ते ज काळ ते आस्रवोथी निवृत्त थाय छे. एटले के पुण्यभाव उपर जे लक्ष हतुं ते लक्ष छूटी जाय छे. भाई! आ तो अंदरनी क्रियानी वातो छे. तारे आ समजवुं पडशे.

भगवान! आ समज्या विना चोरासीना अवतारमां रखडी-रझळीने तुं मरी गयो छे. कळशटीकामां कळश र८मां आवे छे के मरणतोल थई गयो छे. ‘जीव द्रव्य प्रगट ज छे, परंतु कर्मसंयोगथी ढंकायेलुं होवाथी मरणने प्राप्त थई रह्युं हतुं.’ अहा! रागनी रुचिमां, रागना परिणमनना अस्तित्वने ज (निजस्वभाव) स्वीकारीने जीवनुं जे त्रिकाळी जीवन छे तेने मरणतोल करी नाख्युं छे. जीव द्रव्य तो प्रगट ज छे. अहाहा...! विद्यमान चिदानंदघन प्रभु आत्मा तो अस्ति ज छे, प्रगट ज छे. गाथा ४९मां व्यक्त पर्यायनी अपेक्षाए अव्यक्त कह्यो छे ए बीजी वात छे. अहीं कहे छे के अनाकुळ आनंदनो नाथ ध्रुव त्रिकाळी भगवान अस्तिपणे मोजुद प्रगट ज छे. परंतु