Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 819 of 4199

 

समयसार गाथा ७२ ] [ ४७ एनी सन्मुख थया विना, एनाथी विमुख थईने रागनो ज स्वीकार करीने मरणने प्राप्त थई रह्यो छे.

शुं जीव मरतो हशे? भाई! ए तो जीवती-जागती ज्योत सदा प्रगट ज छे. द्रव्य तो त्रिकाळ सत् छे. परंतु जीवनुं जे त्रिकाळी सत्त्व - जीवत्त्व छे एने तें मान्युं नथी. रागनी रुचिमां तारा त्रिकाळी जीवननो तें ईन्कार कर्यो छे तेथी मरणतोल करी नाख्यो एम अहीं कह्युं छे. अरेरे! रागनी रुचिना फंदमां फसाइने तें अनादिथी जन्म-मरणनी परंपरानां कष्टो ज उठाव्यां छे तेथी मरणतोल करी नाख्यो एम कह्युं छे. ‘ते भ्रान्ति परमगुरु श्री तीर्थंकरनो उपदेश सांभळतां मटे छे.’

‘नयननी आळसे रे नीरख्या न नयणे हरि’ -एम आवे छे ने! आ हरि एटले अज्ञान, राग, अने द्वेषने जे हरी ले ते हरि. ए हरि तो चिदानंदघन प्रभु पोते ज छे. आ भगवाननो उपदेश छे. प्रभु! तारी चीज तो रागथी-दया, दान, व्रत, तप आदिना विकल्पथी भिन्न अंदर परम पवित्र शुद्ध चैतन्यमय वस्तु पडी छे. ते सदा मोजुद छे. तेमां द्रष्टि कर. आ भगवाननो उपदेश छे.

कळशटीकामां चोथा कळशमां आवे छे के जिनवचननुं सेवन करवाथी-जिनवचनमां रमवाथी मोहनो नाश थाय छे. एनो अर्थ शुं? भगवान जिनेश्वरदेवे कहेला भावमां जे पुरुष रमे छे तेने मिथ्यात्वकर्मनुं वमन थईने शुद्धात्मानी प्राप्ति थाय छे. दिव्यध्वनि द्वारा कही छे उपादेयरूप शुद्ध जीववस्तु तेमां जे रमे अर्थात् तेनो जे आश्रय करे तेने भ्रान्ति छूटी जाय छे. आ भगवाननो उपदेश छे-के त्रिकाळी आनंदनो नाथ आश्रय करवा योग्य छे.

त्यां कोई वळी कहे छे के-जैनधर्ममां तो बे नयनुं ग्रहण करवानुं कह्युं छे ने?

समाधानः– भाई! बे नयनुं ग्रहण करवुं एटले शुं? बे नयनो विषय तो परस्पर विरुद्ध छे. शुद्धनयरूप आत्मा शुद्ध चैतन्यघन अंदर त्रिकाळी वस्तु मोजुद छे ते एकने ज उपादेयपणे ग्रहण करवानुं भगवाननी देशनामां आव्युं छे. अहाहा! वस्तु जे मलिनता रहित, हीणप रहित अने विपरीतता रहित अतिनिर्मळ पूर्ण चैतन्यमय भगवान छे ते एक ज उपादेय छे एम भगवाननी वाणीनुं फरमान छे. रागथी भिन्न पडीने ज्यां त्रिकाळी शुद्ध द्रव्यने उपादेय कर्युं त्यां रागथी विरुद्ध शुद्ध चैतन्यमय परिणमन थई गयुं. आ रीते आत्मा आस्रवोथी निवृत्त थाय छे. (व्यवहारनय ते काळे जाणेलो प्रयोजनवान छे, आदरेलो नहि. ए ज व्यवहारनयने ग्रहण करवानो आशय छे.

अने जो आत्मा आस्रवोथी निवृत्त न थाय तो तेने साचुं भेदज्ञान थयुं ज नथी, पुण्य- पापना भावथी द्रष्टि खसी गई एनुं नाम भेदज्ञान छे. कोई वळी आमांथी एवो अर्थ काढे छे के पुण्य-पापना भाव बीलकुल थाय ज नहि एने भेदज्ञान कहेवाय. परंतु