४८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ एम नथी, भाई! पुण्य-पापभावनी रुचिथी खसी गयो एने अहीं निवर्त्यो कहे छे. अभिप्रायमां जे राग साथे एक्ता हती ते तूटी गई तेने निवृत्त थयो कहे छे अने ते भेदज्ञान छे. अभिप्रायमां जे आस्रवोथी निवर्ततो नथी तेने भेदज्ञान ज नथी.
बीलकुल रागभाव न होय तो भेदज्ञान छे एम अहीं वात नथी. रागनी रुचिथी खसीने चैतन्यस्वभावनी रुचिमां आवे छे तेनुं नाम सम्यग्दर्शन छे. पुण्यभाव आदि होय, पण धर्मीने एनी रुचि छूटी गई होय छे. द्रष्टिनी अपेक्षाथी अहीं वात छे.
वळी कोई एम कहे के पहेलां क्रोधादिथी निवर्ते अने पछी भेदज्ञान थाय; तो ए वात पण यथार्थ नथी. जे काळे सम्यग्दर्शन-ज्ञान प्रगटे, निर्मळ भेदज्ञान प्रगटे ते ज काळे क्रोधादिनी निवृत्ति थाय छे. बन्नेनो समकाळ छे, पहेलां-पछी छे ज नहि. भाई! अंतर्द्रष्टि थया विना भेदज्ञानना अभावमां अनंतकाळमां जीवे घणुं बधुं कर्युं; व्रत कर्यां, तप कर्यां अरे! हजारो राणीओने छोडीने वनवासी दिगंबर मुनि पण थयो. महाव्रत पाळ्यां अने आकरां तप कर्यां. परंतु एकडा विनाना मींडानी जेम बधुं निरर्थक गयुं. रागनां निमित्त मटाडयां, पण रागनी रुचि न मटी एटले संसार मटयो नहि, लेशमात्र पण सुख न थयुं. छहढालामां आवे छे ने के-
पै निज आतमज्ञान विना सुख लेश न पायो.’
भाई! अंतर्मुखद्रष्टि थया विना रागनी रुचि छूटती नथी अने ज्यां रागनी रुचि होय छे त्यां अंतर्द्रष्टि-भेदज्ञान होतुं नथी. माटे भेदज्ञान अने आस्रवोथी निवर्तन-ए बेनो समकाळ छे एम यथार्थ जाणवुं. (कळशटीकामां कळश २९ मां पण आ वात लीधी छे.)
‘माटे क्रोधादिक आस्रवोथी निवृत्ति साथे जे अविनाभावी छे एवा ज्ञानमात्रथी ज, अज्ञानथी थतो जे पौद्गलिक कर्मनो बंध तेनो निरोध थाय छे.’ क्रोध कहेतां अंदर पूर्णानंदनो नाथ जे ज्ञायकस्वभावी प्रभु आत्मा छे तेथी विमुख थईने रागनी रुचि करे तेने ज्ञायक रुचतो नथी माटे तेने भगवान आत्मा प्रत्ये क्रोध छे. कह्युं छे ने के ‘द्वेष अरोचक भाव’. निज स्वरूपनी अरुचि ते क्रोध छे. आ क्रोध आदि उपरथी जेने द्रष्टि खसी नहि अने स्वभावनी द्रष्टि करी नहि ते आस्रवोथी निवर्त्यो नथी. परंतु ज्यां आस्रवोथी द्रष्टि खसेडी निज चैतन्यस्वरूपमां अभेद थई परिणम्यो के तरत ज तेने अंतर्ज्ञान थयुं, सम्यग्ज्ञान थयुं. आ रागथी भिन्न पडेलुं जे ज्ञान ते ज्ञानमात्रथी ज बंधनो निरोध थाय छे. पहेलां जे एकत्व- विभक्तनी वात करी हती ए शैलीथी अहीं वात छे. अहाहा! स्वभावमां एकत्व अने रागथी विभक्त थाय ते भेदज्ञान छे. अने तेनाथी बंधनो निरोध थाय छे, बंधन अटकी जाय छे.