६० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ अपादान अने अधिकरणस्वरूप) सर्व कारकोना समूहनी प्रक्रियाथी पार ऊतरेली जे निर्मळ अनुभूति, ते अनुभूतिमात्रपणाने लीधे शुद्ध छुं.
आत्मा परनो कर्ता अने पर एनुं कार्य-एवुं एनामां छे ज नहि. आत्मा सिवाय शरीर, मन, वचन, इन्द्रिय, कुटुंब के देश इत्यादि पर द्रव्यनो हुं कर्ता अने एमां जे क्रिया थई ते मारुं कर्म एवुं छे ज नहि. आ वात अहीं लीधी नथी केमके जे परद्रव्य छे ते कार्य विना कदीय कोई काळे खाली नथी. आ एक वात.
हवे बीजी वातः दया, दान, व्रत, तप, भक्ति, पूजाना अशुद्ध भाव थाय तेनो हुं कर्ता अने ते मारुं कर्म, हुं साधन, हुं संप्रदान, मारामांथी थयुं अने मारा आधारे थयुं आवा रागनी क्रियाना षट्कारकनी प्रक्रिया ते आत्माना स्वरूपमां नथी.
हवे त्रीजी वातः एक समयनी निर्मळ पर्यायना षट्कारको-जेमके निर्मळ पर्यायनो कर्ता हुं, निर्मळ पर्याय ते मारुं कर्म, तेनुं साधन हुं, मारा माटे ते थई, माराथी थई, मारा आधारे थई-आम निर्मळ पर्यायना षट्कारकोनी जे प्रक्रिया तेनाथी पार ऊतरेली एटले भिन्न जे निर्मळ अनुभूति ते (त्रिकाळी) अनुभूतिमात्रपणाने लीधे हुं शुद्ध छुं. अहीं ‘अनुभूति’ ए पर्यायनी वात नथी पण त्रिकाळी द्रव्यनी वात छे. पर्यायमां षट्कारकनुं परिणमन स्वतंत्र छे. एनाथी मारी चीज (त्रिकाळी) भिन्न छे. अहाहा! वर्तमान निर्मळ परिणतिथी मारो त्रिकाळी अनुभूतिस्वरूप भगवान भिन्न छे -एने अहीं शुद्ध कह्यो छे.
निर्मळ अनुभूतिनी पर्यायना भेदने लक्षमां लेवो ए व्यवहारनय छे, अशुद्धता छे, मेचकपणुं-मलिनता छे. आत्मा सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र त्रणपणे परिणमे एम लक्षमां लेवुं ए व्यवहारनय छे. ए प्रमाणे (त्रणपणे) आत्माने-पोताने अनुभवतां आस्रवोथी निवृत्ति नहि थाय. प्रवचनसारना नय-अधिकारमां कहे छे के माटीने एना वासण आदि पर्यायना भेदथी जोवी ए अशुद्धनय छे. तेम आ आत्माने तेना षट्कारकना पर्यायना भेदथी जोवो ते अशुद्धनय छे. ज्ञाननी पर्याय, आनंदनी पर्याय, वीर्यनी पर्याय-एम पर्यायना भेदथी आत्मा जोवो ते अशुद्धपणुं छे एनाथी मिथ्यात्वनो आस्रव नहि मटे. अहीं तो कहे छे के षट्कारकनी प्रक्रियाथी भिन्न वस्तु त्रिकाळी अनुभूतिस्वरूप जे भगवान आत्मा छे तेना उपर द्रष्टि आपतां मिथ्यात्वनो आस्रव टळी जाय छे.
दया, दानना विकल्पथी धर्म माने ए तो मिथ्यात्व छे ज, परंतु पोताने निर्मळ पर्यायना भेदथी लक्षमां लेतां जे विकल्प थाय एनाथी धर्म थाय एम माने ते पण मिथ्यात्व छे.
भगवान आत्मा एक समयनी पर्यायना षट्कारकना परिणमनथी पार ऊतरेली-भिन्न अनुभूतिमात्र त्रिकाळी शुद्ध वस्तु छे. आ त्रिकाळी शुद्ध ज्ञायक उपर द्रष्टि जतां