Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७३ ] [ ६१ सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान प्रगटे छे अने त्यारे आत्मा आस्रवथी निवृत्त थाय छे. अहाहा...! विकारना षट्कारकनी परिणमनरूप क्रिया तो दूर रही, अहीं तो ज्ञाननो जे प्रगट अंश एना षट्कारकनी प्रक्रिया-परिणमनथी त्रिकाळी अनुभूतिस्वरूप भगवान भिन्न छे अने एने अहीं शुद्ध कहेल छे. एवा त्रिकाळी शुद्ध आत्मद्रव्यनी द्रष्टि थतां मिथ्यात्वनो आस्रव टळी जाय छे. आ विधिथी जीव आस्रवोथी निवर्ते छे.

जेम शीरो बनाववो होय तो एनी विधि ए छे के-प्रथम आटो घीमां शेके अने पछी एमां गोळनुं पाणी नाखे तो शीरो तैयार थाय. तेम आत्मामां धर्म केम थाय ते समजावे छे. एक समयमां कारकना भेदोथी पार अभेद शुद्ध चैतन्यमय त्रिकाळ वस्तु छे. तेना उपर द्रष्टि आपतां सम्यग्दर्शन-ज्ञान प्रगट थाय छे, अने मिथ्यात्वनो आस्रव छूटी जाय छे. आगळ आवशे के जेम जेम द्रव्यनो आश्रय वधशे तेम तेम आस्रव मटी जशे. आ एनी रीत अने पद्धति छे. बीजी रीते करवा जईश तो मरी जईश तोपण वस्तु प्राप्त नहि थाय. पूर्णानंदनो नाथ अभेद एक चैतन्यमय भगवान छे. एनुं त्रिकाळ टक्तुं जीवन ते एनुं सत्त्व - तत्त्व छे. एनो स्वीकार छोडीने निमित्त, राग अने भेदमां अटकीश तो मिथ्यात्वादि आस्रव थशे, परंतु वीतरागतारूप धर्म नहि थाय. आवो वीतरागनो मार्ग जेम छे तेम समजवो जोईए.

एक स्तुतिकारे कह्युं छे के-

“प्रभु तुम जाणग रीति, सहु जग देखता हो लाल;
निज सत्ताए शुद्ध, सहुने पेखता हो लाल.”

हे नाथ! आप ज्ञानमां त्रणकाळ त्रणलोक जुओ छो. तेमां आप बधा आत्माओ निज सत्ताए परिपूर्ण शुद्ध भगवान छे एम जोई रह्या छो. आ वात अहीं लीधी छे. पर्यायना षट्कारकनी परिणतिथी भिन्न आखुं चैतन्यनुं दळ भगवान आत्मा शुद्ध छे. एने विषय करनारी द्रष्टि पण एमां समाती नथी एवो ए त्रिकाळी एक शुद्ध छे एम भगवाने जोयो छे. ज्यारे एक समयनी पर्यायनुं लक्ष छोडी त्रिकाळी एक शुद्ध अनुभूतिस्वरूप चैतन्य भगवानना लक्षे परिणमन करे छे त्यारे मिथ्यात्वनो नाश थई सम्यग्दर्शननी वीतरागी परिणतिनो उत्पाद थाय छे. आवी अंतरनी क्रिया समजाय नहि एटले कोई दया पाळो, व्रत करो, पूजा-प्रभावना करो- एम बहारनी क्रियाओमां धर्म बतावे एटले राजी-राजी थइ जाय. परंतु भाइ! ए तो बधी रागनी क्रियाओ छे. राग छे ए तो अचेतन आंधळो छे, एमां ज्ञाननुं-चैतन्यनुं किरण नथी. जेम सूरजनुं किरण सफेद उज्ज्वळ होय पण कोलसा जेवुं काळुं न होय, तेम चैतन्यसूर्यनुं पर्यायरूप किरण चैतन्यमय, आनंदमय होय पण आंधळुं रागमय न होय.

आत्मा छ कारकोना समूहनी प्रक्रियाथी पार जे निर्मळ अनुभूतिस्वरूप त्रिकाळी