Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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६२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ शुद्ध चैतन्य भगवान छे ते भूतार्थ छे. तेना उपर द्रष्टि देतां मिथ्यादर्शननो व्यय अने सम्यग्दर्शननो उत्पाद थाय छे. पर्यायना भेदने लक्षमां लेवो ते अशुद्धता छे. एक समयनी जे निर्मळ पर्याय प्रगट थाय तेनाथी भिन्न, संयोगथी भिन्न अने दया, दानना विकल्पथी पण भिन्न अनुभूतिस्वरूप त्रिकाळी शुद्ध द्रव्य छे. तेनो आश्रय करवाथी धर्मनी शरूआत थाय छे. आ धर्म पामवानी विधि छे.

केवळीना केडायतो भगवान श्री कुंदकुंदाचार्यदेव अने श्री अमृतचंद्राचार्यदेव केवळज्ञान केम थाय अने ते पहेलां सम्यग्दर्शन केम थाय एनी रीत बतावे छे. कहे छे के पर्यायना षट्कारकोना भेदनी रुचि छोडीने अखंड एक अनुभूतिस्वरूप त्रिकाळी भगवान अंदर पडयो छे एनो आश्रय कर. त्यारे सम्यग्दर्शन अने सम्यक्मतिश्रुतज्ञान थाय छे.

धवलमां आवे छे के श्रुतज्ञान केवळज्ञानने बोलावे छे. अर्थात् सम्यक् मतिश्रुतज्ञान जेने प्रगट थयुं तेने अल्पकाळमां केवळज्ञान प्रगट थशे ते निश्चित छे. केवळज्ञान-सर्वज्ञपद साध्य छे, परंतु ध्येय तो त्रिकाळी शुद्ध द्रव्य ज छे. परिणतिमां पूर्ण साध्य जे सिद्धदशा प्रगट थाय तेनो आधार-आश्रय त्रिकाळी ध्रुव द्रव्य ज छे. अहाहा...! समजवानी चीज आ ज छे के पर्यायथी पार जे त्रिकाळी भगवान भिन्न छे ते शुद्ध छे अने ते शुद्धनो जे पर्याये निर्णय कर्यो ते पर्याय ते शुद्धमां (द्रव्यमां) नथी. पर्याय पर्यायमां रहीने द्रव्य शुद्ध छे एम अनुभव करे छे. आवो भगवान वीतरागदेवनो मार्ग छे. तेने रागथी के भेदथी प्राप्त करवा जईश तो वस्तु-सत् हाथ नहि आवे.

एक समयमां त्रणकाळ त्रणलोकने जेणे जोया छे ते भगवान (सीमंधर नाथ)नी वाणी श्री कुंदकुंदाचार्यदेवे साक्षात् सांभळी हती. आत्माना अनुभव सहित तेओ महा चारित्रवंत हता. भरतमां पधारी तेमणे संदेश आप्यो के-परने मारी शकुं, परने जीवाडी शकुं, परनी दया पाळी शकुं एम जे माने छे ते मूढ छे, मिथ्याद्रष्टि छे. परना काम करवानो बोजो माथे लईने पोताने परनो कर्ता माने ए मूढ छे, अज्ञानी छे. परनी दयानो भाव आवे ए जुदी वात छे, पण बीजाने जीवाडी शकुं छुं ए मान्यता एकलुं अज्ञान छे. प्रभो! तुं तो ज्ञाता-द्रष्टा छो ने! जाणवुं-देखवुं ए ज तारुं जीवन छे. एने बदले परने सुखी-दुःखी करवानुं माने ए तो तारा ज्ञानस्वभावनो अनादर छे, हिंसा छे. अहीं तो कहे छे के सम्यग्दर्शननी निर्मळ पर्याय जे प्रगट थाय तेनो कर्ता पर्याय पोते, कर्म पोते, साधन पर्याय पोते, इत्यादि छ कारकोना भेदना विकल्पथी पार वस्तु त्रिकाळी शुद्ध छे. ए अखंड एक विज्ञानस्वभावी शुद्धनी द्रष्टि करतां निर्मळ पर्याय प्रगटे छे अने ते धर्म छे. परंतु त्रिकाळी शुद्ध वस्तुमां भेगी पर्यायने भेळवे तो ए सम्यग्दर्शननो विषय रहेतो नथी पण अुशद्धता प्रगट थाय छे. ल्यो, आ बीजो बोल थयो.