६४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ छे. प्रभु! अंदर अनंत अनंत निर्मळ गुणनो खजानो भर्यो छे तेनी सन्मुख ढळतां रागनुं स्वामीपणुं सहज छूटी जाय छे अने ए धर्म छे. भगवान गणधरदेव पण जे रागनुं परिणमन छे तेने जाणे पण तेना स्वामीपणे कदीय परिणमे नहि. पूर्ण वीतरागता न थाय त्यां सुधी धर्मीने व्यवहारना विकल्प आवे खरा, पण ते कर्तव्य छे एम तेना स्वामीपणे ते परिणमता नथी.
४७ शक्तिओमां एक स्वभावमात्र स्वस्वामित्वमयी संबंधशक्ति छेल्ली कहेली छे. द्रव्य-गुण अने पर्याय जे शुद्ध छे ते मारुं स्व अने हुं तेनो स्वामी एवी आत्मामां स्वस्वामित्व संबंधशक्ति छे. ते शक्तिनुं निर्मळ परिणमन थतुं ते धर्म छे.
लोकमां तो हुं पत्नीनो पति, गृहपति, लक्ष्मीपति, क्रोडपति, इत्यादि पोताने जडना पति माने छे, पण ए मूढता छे. कोना पति तारे थवुं छे, भाई? धर्मी कहे छे के जडनो स्वामी तो हुं नहि पण जे राग थाय छे तेनो स्वामी पण हुं नहि. ए रागनो स्वामी पण पुद्गल छे. अहीं हुं एक छुं, शुद्ध छुं एम पहेलां अस्तिथी कह्युं अने रागनुं स्वामीपणुं मने नथी एम निर्मम छुं कहीने नास्तिपणुं बताव्युं.
अहीं कह्युं के क्रोधादि विकारनो स्वामी पुद्गल छे माटे पुद्गलने लईने विकार थाय छे एम कोई माने तो ते यथार्थ नथी. पुद्गलने लईने विकार थयो छे एम नथी. ए तो परद्रव्य छे. पण विकार थयो छे निमित्तना लक्षे ए निश्चित. स्वभावमां-स्वरूपमां तो विकार छे ज नहि अने निमित्तना लक्षे ते थयो छे तेथी पुद्गल एनो स्वामी छे एम कह्युं छे. आम ज्यां जे अपेक्षा होय ते समजवी जोईए.
पुण्यना शुभभाव थाय ए वर्तमान दुःखरूप छे. वळी एना फळमां संयोग मळशे अने एना (संयोग) पर लक्ष जतां पण राग एटले दुःख ज थशे माटे भविष्यमां थवावाळा दुःखना पण ए कारणरूप छे. आ वात आगळ गाथा ७४ मां आवशे. अरे! पुण्यना फळमां अर्हंतादिनो संयोग मळशे अने ए संयोग पर लक्ष जतां राग ज थशे. अहाहा...! सर्वज्ञ परमेश्वर त्रिलोकनाथ एम कहे छे के-प्रभु! अमे तारा माटे परद्रव्य छीए, अने परद्रव्य उपर लक्ष जतां राग ज थशे, धर्म नहि थाय. मोक्षपाहुडनी १६मी गाथामां कह्युं छे के-‘परदव्वाओ दुग्गइ’ परद्रव्य उपर लक्ष जाय ते दुर्गति छे, चैतन्यनी गति नहि. भाई! रागनी परिणति थाय ए चैतन्यनी परिणति नहि. अहाहा...! जेना फळमां केवळज्ञान अने सादि-अनंत अनंत समाधिसुख प्रगटे तेवी दशाने प्राप्त धर्मी जीव एम कहे छे के राग थाय तेना स्वामीपणे सदाय हुं परिणमतो नथी. जे स्वरूपमां नथी अने स्वरूपना आश्रये थयेली निर्मळ स्वपरिणतिमांय नथी ते रागनुं मने स्वामीपणुं नथी. द्रव्य- गुण तो त्रिकाळ निर्मळ छे. तेना आश्रये जे निर्मळ दशा प्रगटी ते मारुं स्व अने हुं तेनो स्वामी छुं एम धर्मी माने छे.