समयसार गाथा ७३ ] [ ६प
स्त्रीने लोको अर्धांगना कहे छे. एम के-अडधुं अंग मारुं अने अडधुं अंग तारुं-एम तेओ माने छे. पण ए तो बधी मूढ लोकोनी भ्रमणा छे, ए तो मिथ्यात्वनी मान्यता छे. परना स्वामीपणानी तो अहीं वात ज कयां छे? अहीं तो कहे छे के रागना स्वामीपणे सदाय नहि परिणमतो एवो हुं निर्मम छुं. आ तो प्रथम आवो विकल्पथी निर्णय करे, पछी स्वभावनो उग्र पुरुषार्थ करतां विकल्प छूटी जाय छे. भाई! आ मार्ग हाथ आवे एना जन्म-मरणना फेरा मटी जाय एवी आ वात छे. आ त्रण बोल थया.
हवे चोथो बोल कहे छेः-- ‘चिन्मात्र ज्योतिनुं (आत्मानुं), वस्तुस्वभावथी ज, सामान्य अने विशेष वडे परिपूर्णपणुं (आखापणुं) होवाथी, हुं ज्ञानदर्शन वडे परिपूर्ण छुं.’ सामान्य ते दर्शन अने विशेष ते ज्ञान; एम दर्शन-ज्ञान वडे परिपूर्ण वस्तु छुं. आत्मा विकारपणे तो नथी, अल्पज्ञपणे पण नथी. अहीं कहे छे के ज्ञान-दर्शनस्वभावथी परिपूर्ण छुं. वर्तमान अल्पज्ञ पर्याय एम निर्णय करे छे के पर्याय जेटलो हुं नहि, पण हुं तो ज्ञान- दर्शनस्वभावथी परिपूर्ण वस्तु छुं.
भाई! आ मिथ्या भ्रान्तिनुं मोटुं तोफान छे तेने शमाववानी-मटाडवानी आ वात चाले छे. मिथ्यात्वरूपी आस्रवथी निवर्तवानो उपाय शुं? आ प्रश्ननो उत्तर चाले छे. कहे छे के हुं ज्ञान-दर्शनथी परिपूर्ण वस्तुविशेष छुं एम प्रथम नक्की कर. सामान्य अने विशेष वडे परिपूर्णपणुं होवाथी हुं आकाशादि द्रव्यनी जेम पारमार्थिक वस्तुविशेष छुं अहीं सुधी तो विकल्पथी निर्णय करवानी वात छे के-
-हुं अखंड ज्ञानज्योतिस्वरूप विज्ञानघनस्वभावपणाने लीधे एक छुं. -षट्कारकना परिणमनथी रहित शुद्ध छुं. -रागपणे सदाय नहि परिणमनारो निर्मम छुं. -ज्ञानदर्शनथी परिपूर्ण वस्तुविशेष छुं.
वर्तमान दशा अल्पज्ञ होवा छतां स्वभावथी हुं परिपूर्ण छुं. आकाश जेम पदार्थ छे, परमाणु जेम पदार्थ छे तेम हुं पण पारमार्थिक वस्तुविशेष छुं, एटले के सर्वथी भिन्न वस्तु छुं. आ प्रमाणे प्रथम विकल्पथी निर्णय करे छे एनी आ वात छे. विकल्प तोडीने अनुभव करवानी वात पछी कहेशे. आ तो बीजाओए (अज्ञानीओए) कहेलो जे आत्मा तेनाथी जुदो परमार्थस्वरूप आत्मानो निर्णय करवा विकल्प द्वारा हुं आवो छुं एम प्रथम शिष्य निर्णय करे छे.
हवे कहे छे-‘तेथी हवे हुं समस्त परद्रव्यप्रवृत्तिथी निवृत्ति वडे आ ज आत्मस्वभावमां निश्चळ रहेतो थको, समस्त परद्रव्यना निमित्तथी विशेषरूप चेतनमां थता जे चंचळ कल्लोलो तेमना निरोध वडे आने ज (आ चैतन्यस्वरूपने ज)