Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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६६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ अनुभवतो थको, पोताना अज्ञान वडे आत्मामां उत्पन्न थता जे आ क्रोधादिक भावो ते सर्वने क्षय करुं छुं.’

रागादि विकारो परद्रव्यनी प्रवृत्ति छे अने ते निमित्तना आश्रये उत्पन्न थाय छे. प्रथम कह्युं के विकारी भावोनो स्वामी पुद्गल छे. हवे कह्युं के ते परद्रव्यप्रवृत्ति छे. ते पोताना अपराधथी परद्रव्यना निमित्ते थाय छे. ते परद्रव्यना निमित्तथी विशेषरूप चेतनमां थता जे चंचळ कल्लोलो तेमना निरोध वडे आ चैतन्यस्वरूपने ज अनुभवुं छुं-एम कहे छे.

अहो! अमृतचंद्राचार्ये अमृत रेडयां छे! चेतनमां थता जे चंचळ कल्लोलो ते पर्यायमां पोताना अपराधथी थाय छे, परद्रव्य तो निमित्तमात्र छे. तेना निरोध वडे चैतन्यस्वरूपने अनुभवतो हुं पोताना अज्ञान वडे आत्मामां उत्पन्न थता जे आ क्रोधादिक भावो ते सर्वने क्षय करुं छुं. क्रोधादिक विकार उत्पन्न केम थाय छे? तो कहे छे के स्वरूपनुं ज्ञान नथी माटे पोताना अज्ञान वडे आस्रवो उत्पन्न थाय छे. परंतु कहे छे के हवे परद्रव्यनुं लक्ष छोडी स्वरूप भणी ढळतां निज चैतन्यस्वरूपने अनुभवतो हुं जे आ क्रोधादिक भावो ते सर्वने क्षय करुं छुं. ज्ञानदर्शनस्वरूप परिपूर्ण एक शुद्ध वस्तु जे आत्मा तेनो अनुभव करतां आस्रवोथी हुं निवर्तु छुं.

पहेलां परमार्थरूप वस्तुस्वरूप कह्युं के हुं एक छुं, शुद्ध छुं, रागना स्वामीपणे सदाय नहि परिणमतो निर्मम छुं, ज्ञानदर्शन-पूर्ण छुं, परमार्थ वस्तुविशेष छुं. हवे पर्यायनी वात करी के पर्यायमां राग थयो केम? तो कहे छे के परद्रव्यना निमित्तथी चेतनमां विशेषरूप चंचळ कल्लोलो-विकल्पो थता हता. ते सर्वना निरोध वडे चैतन्यस्वरूपने अनुभवतो ते आस्रवोनो क्षय करुं छुं. आस्रवनो निरोध संवर छे. पुण्य-पापना विकल्पो ते आस्रवो छे. पर्यायमां उत्पन्न थता पुण्य-पापना जे चंचळ कल्लोलो तेनो निर्मळ शुद्ध चैतन्यस्वरूपना आश्रये निरोध करतां आस्रवोनी निवृत्ति-क्षय थाय छे. ज्ञानदर्शनथी परिपूर्ण शुद्ध चैतन्य भगवान छे. तेनो अनुभव करतां चेतनमां थता चंचळ कल्लोलोनो निरोध थाय छे अने आस्रवोथी निवृत्ति थाय छे. मिथ्यात्वने छोडवानी आ रीत छे.

प्रश्नः- व्यवहार साधन छे के नहि? पंचास्तिकायमां साधन कह्युं छे.

उत्तरः– पंचास्तिकायमां भिन्न साध्य-साधननी वात आवे छे. परंतु ए तो साधननुं निरूपण बे प्रकारे छे, साधन बे प्रकारनां नथी. साधन तो एक ज प्रकारनुं छे. मोक्षमार्गप्रकाशकमां पंडितप्रवर श्री टोडरमलजी कहे छे के जेने निश्चय सम्यग्दर्शन थयुं छे त्यां एनी साथे देव-गुरु-शास्त्रनो राग सहचरपणे होय छे. तेने सहचर देखीने, निमित्तथी उपचार करीने व्यवहार समकित कहेवामां आवे छे. खरेखर छे तो राग-