समयसार गाथा ७३ ] [ ६७ बंधनुं कारण, पण सहचर देखीने आरोप कर्यो छे. पछी लख्युं छे के सर्वत्र निश्चय-व्यवहारनुं आवुं लक्षण जाणवुं.
रागथी भिन्न पडीने अनुभव द्वारा स्वरूपनुं निश्चय साधन प्रगट थयुं छे त्यां साथे रागनी मंदतानुं सहचरपणुं देखीने तेने व्यवहार साधननो आरोप आपवामां आव्यो छे. ए तो उपचारथी आरोप आप्यो छे, ए कांई यथार्थ साधन नथी. साधन बे नथी, पण तेनुं निरूपण बे प्रकारे छे. कारण तो एक ज छे. साधन कहो, कारण कहो, उपाय कहो-ए बधुं एक ज छे, एक ज प्रकारे छे. कथन बे प्रकारे होय छे-एक निश्चय अने बीजुं व्यवहार; तेमां निश्चय ते सत्यार्थ छे अने व्यवहार ते उपचार-असत्यार्थ छे.
आत्मामां पुण्य-पापना क्रोधादि भावो कयांथी थया? ए भावो कांई जडमां तो थया नथी. पोतानी पर्यायमां पोताना अपराधथी अज्ञानथी उत्पन्न थया छे. अज्ञानवडे उत्पन्न थयेला ते आस्रवो द्रव्यद्रष्टि वडे, शुद्ध चैतन्यना आश्रयना पुरुषार्थ वडे, सर्व क्षय करुं छुं एम अहीं कह्युं छे. द्रव्यद्रष्टिमां सर्व आस्रवोनी नास्ति छे तेथी सर्वने क्षय करुं छुं एम कह्युं छे. अल्प अस्थिरता रही छे ते पण पुरुषार्थना बळे अल्पकाळमां क्षय थवा योग्य छे तेथी सर्वने क्षय करुं छुं एम लीधुं छे. प्रथम तो आवो विकल्पमां निश्चय थाय छे एनी आ वात थई. मार्गने पामवानी आ रीत छे.
‘एम आत्मामां निश्चय करीने, घणा वखतथी पकडेलुं जे वहाण तेने जेणे छोडी दीधुं छे एवा समुद्रना वमळनी जेम जेणे सर्व विकल्पोने जलदी वमी नाख्या छे एवो, निर्विकल्प अचलित निर्मळ आत्माने अवलंबतो, विज्ञानघन थयो थको, आ आत्मा आस्रवोथी निवर्ते छे.’
जुओ! आत्मामां आम निश्चय करीने-एम कह्युं छे. भाई! मार्ग जेवो छे तेवो प्रथम निश्चय करवो जोईए. तेमां बीजी रीते मानवा जईश तो मार्ग हाथ नहि आवे. मिथ्यात्वना आस्रवथी निवर्तवा माटे पहेलां आंगणामां ऊभा रहीने पोतानी चीज आ छे एवो यथार्थ निश्चय करवो जोईए. आवो निश्चय करीने अंदर प्रवेशीने अनुभव वडे सर्व आस्रवोनो क्षय करुं छुं एम कह्युं छे. आ अप्रतिहत पुरुषार्थना उपाडनी वात करी छे.
अहो! संतोए गजब काम कर्यां छे. ७२मी गाथामां तो एने त्रण त्रण वार भगवान कहीने बोलाव्यो छे. जाग रे नाथ! जाग; रागमां एकत्व करीने सूवुं तने पालवे नहि. निर्मळ परिणतिमां जाग्रत थवुं ए तारी शोभा छे, भगवान! भगवान तुं अत्यंत शुचि, विज्ञानघनस्वरूप अने सुखनुं कारण छो. आवो भगवान आत्मा छे तेनो अनुभव करतां आस्रवोनो क्षय थाय छे. परिभाषा सूत्र बांध्युं छे ने! गाथा ७२ पछी यथास्थाने आ गाथा ७३ मूकी छे. दरेक गाथा यथास्थाने मूकी छे. कहे छे-भगवान