६८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ तुं रागना रंगे रोळाई गयो छे एने आ नवो शुद्ध चैतन्यनो रंग चढावी दे. प्रभु! तुं वीतरागमूर्ति जिनस्वरूप ज छो. हवे निर्णय कर अने रागथी निवृत्त था. अहाहा...! हुं ज्ञानदर्शनथी परिपूर्ण छुं एम निश्चय करीने स्वभावमां ढळतां राग-द्वेषनो क्षय थाय छे.
जुओ! घणा वखतथी पकडेलुं जे वहाण तेने जेणे छोडी दीधुं छे एवा समुद्रना वमळनी जेम जेणे सर्व विकल्पोने जलदी वमी नाख्या छे ते आस्रवोथी निवृत्त थाय छे. वमळे घणा वखतथी वहाणने पकडयुं हतुं ते वमळ छूटे एटले वहाण गति करे. समुद्रना वमळनी जेम सर्व विकल्पो जेणे जलदीथी वमी नाख्या ते आस्रवोथी निवृत्त थाय छे. विकल्पोने वमी नाख्या एटले के फरीथी ते हवे उत्पन्न थशे नहि-एम अर्थ छे. प्रवचनसार गाथा ९२मां आवे छे के- ‘अने ते (बहिर्मोहद्रष्टि) तो आगमकौशल्य तथा आत्मज्ञान वडे हणाई गई होवाथी हवे मने फरीने उत्पन्न थवानी नथी.’ आ पंचम आराना मुनि कहे छे. आवी अप्रतिहत भावनी वात छे. द्रष्टांतमां एम लीधुं के वमळ छूटतां वहाणने छोडी दीधुं छे. सिद्धांतमां एम कह्युं के ज्ञानस्वरूपमां ज्यां एकाग्र थयो एटले विकल्पो तूटी गया. त्यां विकल्पोने एवा वमी नाख्या के फरीने हवे ते उत्पन्न थवाना नथी. मुनिराज कहे छे के अमे अप्रतिहत भावे उपडया छीए. क्षयोपशममांथी क्षायिक समकित लेशुं, पण वच्चे पडवानी वात ज नथी.
अहाहा...! जुओ, आ दिगंबर संतोना अंतरना आनंदनी मस्ती! आ पंचम आराना मुनिवरो पोकार करीने बहु ऊंचेथी कहे छे के हजारो वर्षथी बहारमां भगवाननो विरह होवा छतां अमारो अंतरंग निर्मळानंदनो नाथ चैतन्य भगवान अमने समीप वर्ते छे. कोई पूछे के भगवान केवळी पासे तमे गया हता? तो कहे छे-भाई! सांभळ! मारो नाथ भगवान आत्मा चैतन्य प्रभु छे तेनी पासे अमे गया छीए. त्यांथी अंतरमां अवाज आव्यो छे के विकल्पोने अमे एवा वमी नाख्या छे के फरीने हवे ते उत्पन्न थवाना नथी. अहाहा...! वस्तु परमपारिणामिकस्वभावे जे त्रिकाळ ध्रुव छे तेनी सन्मुख थतां जे स्वानुभव प्रगट थयो छे ते मोक्ष लईने ज पूर्ण थशे. हवे फरीने मिथ्यात्व थशे ए वात छे ज नहि. आ प्रमाणे सर्व विकल्पोने जलदी एकदम शीघ्र वमी नाख्या छे एवो निर्विकल्प अचलित निर्मळ आत्माने अवलंबतो विज्ञानघन थयो थको, आ आत्मा आस्रवोथी निवर्ते छे.
अभेद, अचलित, निर्मळ भगवान आत्मा विज्ञानघन छे. रूना धोकळामां पोलाण होय छे, परंतु आनंदनो नाथ प्रभु आत्मा तो एकलो विज्ञानघन छे. (एमां कोई परनो प्रवेश शकय नथी) एवा अचलित निर्मळ आत्माने अवलंबतो, विज्ञानघन थयो थको अभेद एकपणे परिणमतो आ आत्मा आस्रवोथी निवर्ते छे.
पर्याय ज्यां द्रव्यसन्मुख ढळी एटले ते द्रव्यथी अभेद थई. खरेखर तो पर्याय