समयसार गाथा ७३ ] [ ६९ पर्यायमां तन्मय छे, द्रव्यमां नहि. तन्मय एटले पर्याय द्रव्याभिमुख थई, द्रव्य प्रति ढळी छे एम अर्थ छे. विज्ञानघन थयो एटले शुं? के ज्ञाननी पर्याय जे अस्थिर बहिर्मुख हती ते द्रव्यमां अंतर्मुख वळीने स्थिर थई तेने विज्ञानघन थयो कहेवामां आवे छे.
७४ मी गाथामां आवशे के जेम जेम विज्ञानघनस्वभाव थतो जाय छे तेम तेम आस्रवोथी निवृत्त थतो जाय छे. आ पर्यायनी वात छे हों. अहाहा...! वस्तु त्रिकाळी विज्ञानघनस्वभाव छे. तेमां एकाग्र थतां ते पर्यायमां विज्ञानघन थयो थको आस्रवोथी निवृत्त थाय छे. आस्रवोथी निवर्तवानो आ ज मार्ग छे. कह्युं छे ने के-
अरे! दुनिया कयांय पडी छे, अने मार्ग कयांय रह्यो छे! भाई! वीतरागनो मार्ग रागनी मंदता वडे पमाय एम नथी. अहीं तो कहे छे के चैतन्यस्वरूप ध्रुव वस्तुमां एकाग्र थयो थको अने तेनेअनुभवतो थको आ आत्मा आस्रवोथी निवर्ते छे.
भाषा सादी पण भाव बहु उंचा छे, भाई! जन्म-मरणना अंत लाववानी आ वात छे. आमां व्यवहारथी थाय ने आम थाय एवा वादविवादने कोई अवकाश नथी. जेनाथी निवर्तवुं छे एनाथी (मुक्ति) थाय एम केम होई शके, भाई?
प्रश्नः– परंपरा कारण (शास्त्रोमां) कह्युं छे ने?
उत्तरः– जेने शुद्धतानो अनुभव प्रगट थयो छे तेने शुभरागमां अुशभराग टळ्यो छे. तेना शुभरागने व्यवहारथी परंपरा कारण कहेवामां आव्युं छे. ए तो उपचार कथन छे. परंतु निश्चय विना व्यवहार परंपरा मोक्षनुं कारण केवुं? एम छे ज नहि. अनादिरूढ व्यवहारमां अज्ञानी मूढ छे. निश्चय विना जे व्यवहारमां लीन छे ए तो व्यवहारमूढ छे. जाणनारो अंदर ज्यां जाग्यो, निश्चयमां आरूढ थयो त्यारे तेने जे रागनी मंदता होय तेना उपर निश्चयनो आरोप आपवामां आवे छे.
आवी भगवाननी फरमावेली वात संतो आडतिया थईने जाहेर करे छे. अंर्तसन्मुख थतां जेने (सम्यग्दर्शननी) बीज उगी तेने पूनम (केवळज्ञान) थये ज छूटको छे. अहाहा...! शुद्ध चैतन्यघन प्रभु आत्माना अवलंबने जेने विज्ञानघन पर्याय प्रगट थई तेने पूर्ण विज्ञानघन-केवळज्ञान थशे ज आवी आ वात छे.
ममतारहित छुं, ज्ञानदर्शनथी पूर्ण वस्तु छुं.’ आम निश्चय करीने ज्यारे ते ज्ञानी आत्मा आवा पोताना स्वरूपमां रहेतो थको तेना ज अनुभवरूप थाय त्यारे