Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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७० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ क्रोधादिक आस्रवो क्षय पामे छे. अनादिथी रागमां रहेतो हतो ते हवे पोताना चैतन्य- स्वरूपमां रहेतो थको प्रथम मिथ्यात्वना आस्रवथी-दुःखथी निवृत्त थाय छे.

स्वरूपथी जे विरुद्ध भावो छे ते क्रोधादि छे. चाहे तो पुण्यरूप शुभभाव होय तोपण ते चैतन्यस्वभावथी विरुद्ध छे माटे क्रोधादि छे. आ क्रोधादि आस्रवो स्वरूपना लक्षे तेना अनुभवथी क्षय पामे छे. मिथ्यात्वरूपी आस्रवथी निवृत्त थवानो आ एक ज उपाय छे, अने ते धर्म छे. भाई! रागथी छूटुं पडवुं ते धर्म छे. त्यां राग (धर्मनुं) साधन थाय एम केम बनी शके? न ज बनी शके. अहीं कह्युं ने के रागना जे चंचळ कल्लोलो अनुभवतो हतो, तेनो निरोध करीने ज्यां त्रिकाळी ध्रुव चैतन्यमय विज्ञानघन-स्वभावमय वस्तुमां निमग्न थयो, त्यां आस्रवो क्षय पामे छे अने स्वरूपना आनंदनो आस्वाद प्राप्त थाय छे.

प्रश्नः- देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धानो राग अने व्यवहार चारित्रनी आचरणनी क्रिया ए बधां साधन-उपाय छे के नहि?

उत्तरः– बीलकुल नहि. भाई! ए रागनी क्रियाओ तो बधी आस्रव छे. तेनो तो क्षय करवानो छे. ते साधन थाय एम कदीय बनी शके नहि. प्रभु! आम ने आम (खोटी मान्यतामां) जींदगी चाली जशे. छेवटे डूबकी संसारमां ऊंडे मारशे त्यां तने भारे दुःख थशे. तेनाथी छूटवानो तो आ एक ज मार्ग छे. भाई! वस्तु जे ज्ञानदर्शनथी परिपूर्ण छे तेमां एकाग्रता करी, तल्लीन थई स्वरूपने अनुभववुं आ एक ज दुःखना क्षयनो उपाय छे.

भगवान आत्मा निराकुळ आनंदस्वरूप परमात्मा छे. तेमां द्रष्टि एकाकार करतां ते आस्रवोथी-दुःखथी निवर्ते छे. अहा! कोई प्रतिकूळ संजोगो दुःखरूप नथी पण पुण्य-पापना भाव ते दुःखरूप छे, आकुळतामय छे. तेने मटाडवा चाहे छे तो कहे छे के-ज्यां निराकुळ आनंदस्वरूप चैतन्य प्रभु बिराजे छे त्यां जा ने, एमां लीन था ने, एनो अनुभव कर ने! तेथी तुं दुःखथी निवृत्त थशे. कठण लागे तोपण मार्ग तो आ ज छे. भाई! बीजो रस्तो लेवा जईश तो भव चाल्यो जशे अने चोरासीना अवतार ऊभा रहेशे.

जेम समुद्रना वमळे घणा काळथी वहाणने पकडी राख्युं होय पण पछी ज्यारे वमळ शमे त्यारे ते वहाणने छोडी दे छे, तेम आत्मा विकल्पना वमळने शमावतो थको आस्रवोने छोडी दे छे. वमळ छोडे तो वहाण छूटे तेम आ विकल्प छोडे तो स्थिर थाय एम कहेवा मागे छे. आत्मा विकल्पोनी जाळमां गुंचाई गयो छे तेने छोडतो थको ते आस्रवोने छोडी दे छे. ज्यां स्वभाव बाजु ढळ्‌यो अने एमां ठर्यो त्यां विकल्पो सहेजे छूटी जाय छे अने निर्विकल्प सम्यग्दर्शन प्रगट थाय छे. मिथ्यात्वना आस्रवथी छूटवानी आ ज रीत छे.