Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७३ ] [ ७१

व्यवहार साधक छे अने व्यवहार करतां करतां निश्चय प्राप्त थशे एम कोई कहे तो ते मिथ्या छे. वळी निश्चय सम्यग्दर्शन शुं छे एनी खबर न पडे एम कोई कहे तो ए पण मिथ्या छे. निज शुद्ध आत्मानो अनुभव थतां जे निराकुळ आनंदनो स्वाद आवे एनी खबर न पडे एवुं न होय. प्रभु! तुं परमात्मस्वरूप छो. स्वभावथी सामर्थ्यरूपे पोते परमात्मा छे. तेनो निर्णय करीने एमां ढळतां जे अनुभव थाय एमां निराकुळ आनंदनो स्वाद आवे छे अने त्यारे आस्रवथी-दुःखथी निवर्ते छे. आवी वात छे.

प्रश्नः- व्यवहार आवे छे ने?

उत्तरः– ज्यां सुधी पूर्ण वीतराग न थाय त्यां सुधी समकितीने व्यवहार आवे छे. देव-गुरु-शास्त्रनी भक्ति-पूजा इत्यादि तथा व्यवहाररत्नत्रयना रागनो व्यवहार तेने होय छे. परंतु रागना स्वामीपणे सदाय नहि परिणमतो एवो हुं निर्मम छुं एम एने अंतरमां निश्चय थयेलो छे अने ते प्रमाणे जे व्यवहार आवे छे तेनो स्वामी थतो नथी. व्यवहारनो स्वामी थतो नथी पछी व्यवहारथी निश्चय थाय ए वात कयां रही? जेनाथी निवर्तवुं छुं, जेने टाळवा छे एने (निवर्तवामां) मदद करे एम केम होय शके? न ज होई शके. आवी ज वस्तुस्थिति छे अने आ ज मार्ग छे. ल्यो, ७३ (गाथा) पूरी थई.

[प्रवचन नं. १२४ थी १२६ * दिनांक १३-७-७६ थी १प-७-७६]