कथं ज्ञानास्रवनिवृत्त्योः समकालत्वमिति चेत्–
दुक्खा दुक्खफल त्ति य णादूण णिवत्तदे तेहिं।। ७४।।
दुःखानि दुःखफला इति च ज्ञात्वा निवर्तते तेभ्यः।। ७४।।
हवे पूछे छे के ज्ञान थवानो अने आस्रवोनी निवृत्तिनो समकाळ (एक काळ) कई रीते छे? तेना उत्तररूप गाथा कहे छेः-
ए दुःख,
गाथार्थः– [एते] आ आस्रवो [जीवनिबद्धाः] जीवनी साथे निबद्ध छे, [अध्रुवाः] अध्रुव छे, [अनित्याः] अनित्य छे [तथा च] तेम ज [अशरणाः] अशरण छे, [च] वळी तेओ [दुःखानि] दुःखरूप छे, [दुःखफलाः] दुःख ज जेमनुं फळ छे एवा छे, - [इति ज्ञात्वा] एवुं जाणीने ज्ञानी [तेभ्यः] तेमनाथी [निवर्तते] निवृत्ति करे छे.
टीकाः– वृक्ष अने लाखनी जेम वध्य-घातकस्वभावपणुं होवाथी आस्रवो जीव साथे बंधायेला छे; परंतु अविरुद्धस्वभावपणानो अभाव होवाथी तेओ जीव ज नथी. (लाखना निमित्तथी पीपळ आदि वृक्षनो नाश थाय छे. लाख घातक अर्थात् हणनार छे अने वृक्ष वध्य अर्थात् हणावायोग्य छे. आ रीते लाख अने वृक्षनो स्वभाव एकबीजाथी विरुद्ध छे माटे लाख वृक्ष साथे मात्र बंधायेली ज छे; लाख पोते वृक्ष नथी. तेवी रीते आस्रवो घातक छे अने आत्मा वध्य छे. आम विरुद्ध स्वभावो होवाथी आस्रवो पोते जीव नथी.) आस्रवो वाईना वेगनी जेम वधता-घटता होवाथी अध्रुव छे; चैतन्यमात्र जीव ज ध्रुव छे. आस्रवो शीतदाहज्वरना आवेशनी जेम अनुक्रमे उत्पन्न थता होवाथी अनित्य छे; विज्ञानघन जेनो स्वभाव छे एवो जीव ज नित्य छे. जेम कामसेवनमां वीर्य छूटी जाय ते क्षणे ज दारुण कामनो संस्कार नाश पामी जाय छे, कोईथी रोकी राखी शकातो नथी, तेम कर्मोदय छूटी जाय ते क्षणे ज आस्रवो नाश पामी जाय छे, रोकी राखी शकाता नथी, माटे तेओ अशरण छे; आपोआप (पोताथी ज) रक्षित