समयसार गाथा ७४ ] [ ७३ एवो सहज चित्शक्तिरूप जीव ज शरणसहित छे. आस्रवो सदाय आकुळ स्वभाववाळा होवाथी दुःखरूप छे; सदाय निराकुळ स्वभाववाळो जीव ज अदुःखरूप अर्थात् सुखरूप छे. आस्रवो आगामी काळमां आकुळताने उत्पन्न करनारा एवा पुद्गलपरिणामना हेतु होवाथी दुःखफळरूप छे (अर्थात् दुःख जेमनुं फळ छे एवा छे); जीव ज समस्त पुद्गलपरिणामनो अहेतु होवाथी अदुःखफळ छे (अर्थात् दुःखफळरूप नथी).-आम आस्रवोनुं अने जीवनुं भेदज्ञान थतां वेंत ज जेनामां कर्मविपाक शिथिल थई गयो छे एवो ते आत्मा, जथ्थाबंध वादळांनी रचना जेमां खंडित थई गई छे एवा दिशाना विस्तारनी जेम अमर्याद जेनो विस्तार (फेलाव) छे एवो, सहजपणे विकास पामती चित्शक्ति वडे जेम जेम विज्ञानघन- स्वभाव थतो जाय छे तेम तेम आस्रवोथी निवृत्त थतो जाय छे, अने जेम जेम आस्रवोथी निवृत्त थतो जाय छे तेम तेम विज्ञानघनस्वभाव थतो जाय छे; तेटलो विज्ञानघनस्वभाव थाय छे जेटलो सम्यक् प्रकारे आस्रवोथी निवर्ते छे. अने तेटलो आस्रवोथी निवर्ते छे जेटलो सम्यक् प्रकारे विज्ञानघनस्वभाव थाय छे. आ रीते ज्ञानने अने आस्रवोनी निवृत्तिने समकाळपणुं छे.
जेटला जेटला अंशे आत्मा विज्ञानघनस्वभाव थाय छे ते ते प्रकारे तेटला तेटला अंशे ते आस्रवोथी निवर्ते छे. ज्यारे संपूर्ण विज्ञानघनस्वभाव थाय छे त्यारे समस्त आस्रवोथी निवर्ते छे. आम ज्ञाननो अने आस्रवनिवृत्तनो एक काळ छे.
आ आस्रवो टळवानुं अने संवर थवानुं वर्णन गुणस्थानोनी परिपाटीरूपे तत्त्वार्थसूत्रनी टीका आदि सिद्धांतशास्त्रोमां छे त्यांथी जाणवुं. अहीं तो सामान्य प्रकरण छे तेथी सामान्यपणे कह्युं छे.
‘आत्मा विज्ञानघनस्वभाव थतो जाय छे’ एटले शुं? तेनो उत्तरः– ‘आत्मा विज्ञानघनस्वभाव थतो जाय छे एटले आत्मा ज्ञानमां स्थिर थतो जाय छे.’ ज्यां सुधी मिथ्यात्व होय त्यां सुधी ज्ञानने-भले ज्ञाननो उघाड घणो होय तोपण-अज्ञान कहेवामां आवे छे अने मिथ्यात्व गया पछी तेने-भले ज्ञाननो उघाड थोडो होय तोपण-विज्ञान कहेवामां आवे छे. जेम जेम ते ज्ञान अर्थात् विज्ञान जामतुं-घट थतुं-स्थिर थतुं जाय छे तेम तेम आस्रवोनी निवृत्ति थती जाय छे अने जेम जेम आस्रवोनी निवृत्ति थती जाय छे तेम तेम ज्ञान (विज्ञान) जामतुं-घट थतुं-स्थिर थतुं जाय छे, अर्थात् आत्मा विज्ञानघनस्वभाव थतो जाय छे.
हवे आ ज अर्थना कळशरूप तथा आगळना कथननी सूचनिकारूप काव्य कहे छेः-