७४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
स्वं विज्ञानघनस्वभावमभयादास्तिध्नुवानः परम्।
अज्ञानोत्थितकर्तृकर्मकलनात् क्लेशान्निवृत्तः स्वयं
ज्ञानीभूत इतश्चकास्ति जगतः साक्षी पुराणः पुमान्।। ४८।।
[परद्रव्यात्] परद्रव्यथी [परां निवृत्तिं विरचय्य] उत्कृष्ट (सर्व प्रकारे) निवृत्ति करीने [विज्ञानघनस्वभावम् परम् स्वं अभयात् आस्तिध्नुवानः] विज्ञानघनस्वभावरूप एवा केवळ पोताना पर निर्भयपणे आरूढ थतो अर्थात् पोतानो आश्रय करतो (अथवा पोताने निःशंकपणे आस्तिकयभावथी स्थिर करतो), [अज्ञानोत्थितकर्तृकर्मकलनात् कॢेशात्] अज्ञानथी उत्पन्न थयेली कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिना अभ्यासथी थयेला कलेशथी [निवृत्तः] निवृत्त थयेलो, [स्वयं ज्ञानीभूतः] पोते ज्ञानस्वरूप थयो थको, [जगतः साक्षी] जगतनो साक्षी (ज्ञाताद्रष्टा), [पुराणः पुमान्] पुराण पुरुष (आत्मा) [इतः चकास्ति] अहींथी हवे प्रकाशमान थाय छे. ४८.
हवे पूछे छे के ज्ञान थवानो अने आस्रवोनी निवृत्तिनो समकाळ (एक काळ) कई रीते छे? प्रभो! जे क्षणे ज्ञान थयुं ते ज क्षणे आस्रवोथी जीव निवृत्त थाय एम कई रीते छे? आ प्रश्नना उत्तररूप गाथा कहे छेः-
‘वृक्ष अने लाखनी जेम वध्य-घातकस्वभावपणुं होवाथी आस्रवो जीव साथे बंधायेला छे.’ पीपळ, बावळ इत्यादि घणा वृक्षोने लाख आवे छे. पीपळनुं वृक्ष अने लाख वध्य- घातक छे. वृक्ष वध्य एटले घात थवा लायक छे अने लाख घातक एटले घात करनार छे. घणां वर्ष पहेलां भावनगरमां गुजरी बजार पासे पीपळनां झाड हतां, हारबंध झाड हतां. त्यां लाख आवतां बधां वृक्षोनो खो थई गयो, एके झाड न रह्युं. ए अहीं कह्युं छे के लाख घातक-हणनार छे अने वृक्ष वध्य-हणावायोग्य छे. आ रीते वृक्ष अने लाखनो स्वभाव एकबीजाथी विरुद्ध छे. लाख वृक्ष साथे मात्र बंधायेली ज छे; लाख पोते वृक्ष नथी.
तेवी रीते आस्रवो घातक छे अने आत्मा वध्य छे. आम विरुद्ध स्वभावो होवाथी आस्रवो पोते जीव नथी. अहाहा...! भगवान आत्मा अतीन्द्रिय आनंदनो नाथ प्रभु चैतन्यनुं झाड छे. एनी पर्यायमां ते हणावा योग्य छे, वध्य छे. पुण्य-पापना भावो एनो