समयसार गाथा ७४ ] [ ७प पर्यायमां घात करे छे. अहा! पुण्यनो भाव घातक छे अने पर्याय घात थवा योग्य छे. पर्यायमां घात थाय छे. द्रव्यनो कयां घात थाय छे? भगवान आत्मा झाड समान छे अने पुण्य पापना भाव लाख समान छे. पुण्य-पापना भाव आत्मानी शान्तिना घातक छे अने आत्मानी शान्ति घात थवा योग्य छे.
‘अविरुद्धस्वभावपणानो अभाव होवाथी तेओ जीव ज नथी.’ जेम लाखनो झाडथी विरुद्ध स्वभाव छे तेम पुण्य-पापरूप आस्रवोनो स्वभाव आत्माना स्वभावथी विरुद्ध छे. तेमने अविरुद्धस्वभावपणानो अभाव छे. देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धानो विकल्प ऊठे के पंच-महाव्रतनो विकल्प ऊठे-ए जीवना स्वभावथी विरुद्ध स्वभाववाळा छे. पुण्य-पापना भावो विरुद्ध स्वभाववाळा होवाथी तेओ जीव ज नथी. जेम लाख झाड नथी, तेम पुण्य-पापना भाव जीव नथी, राग ते ज्ञान नथी; समजाय छे कांई?
व्यवहार साधक, साधक कहे छे ने? अत्यारे तो व्यवहार ज छे, निश्चय छे ज नहि, निश्चयनी खबर पडे नहि-आम केटलाक प्ररूपणा करे छे. अरे प्रभु! आ तुं शुं कहे छे? तारे कयां जवुं छे, बापु? भाई! तारे कयां रहेवुं छे? जेनाथी खसवुं छे, निवर्तवुं छे एमां रहीश, अटकीश तो एनो (निवर्तवानो) के दि’ पार आवशे? जन्म-मरणनो अंत कयारे आवशे? बापु! पुण्य-पापना भावथी तो हठवुं छे. जेम पापथी हठवुं छे तेम पुण्यथी पण हठवुं ज छे. पुण्य-पाप बेय एक ज वस्तु-आस्रव छे. योगसारमां आवे छे के-(दोहा ७१)
पुण्य-पाप अधिकारमां छेल्ले संस्कृत टीकामां पण आ वात लीधी छे. त्यां प्रश्न थयो के-प्रभु! आ अधिकार पापनो चाले छे ने? एमां आ पुण्य कयां लीधुं? त्यां कह्युं छे के खरेखर तो ए पाप ज छे. पुण्य छे ते व्यवहारे पवित्रतानुं निमित्त कहेवाय, पण खरेखर तो ए पाप छे. निमित्तनो अर्थ ए के ते परवस्तु छे, तेनाथी कांई लाभ छे एम अर्थ नथी. निमित्तनो अर्थ तेनी उपस्थिति छे. निश्चय होय त्यां व्यवहार होय छे एटले उपस्थिति कहेवाय, पण ए घातक छे, दुःखरूप छे.
व्यवहार आवे छे, होय छे. व्यवहारनुं अस्तित्व छे. व्यवहारनयनो विषय नथी एम नथी. परंतु ते आत्माना स्वभावनो पर्यायमां घातक छे. अहीं कहे छे पुण्य-भावमां आत्माना स्वभावथी अविरुद्ध स्वभावनो अभाव छे. भगवान आत्मानो शुद्ध निर्मळ अनाकुळ आनंदरूप चैतन्यस्वभाव छे. अने पुण्यना भाव तो दुःखरूप भाव छे. आमां तडजोड-वाणियावेडा न चाले. (अर्थात् तडजोडने अवकाश नथी)
एक वाणियाने एक कणबी पासे पांच हजार लेणा हता. वाणियाने मनमां ख्याल