Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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७६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ हतो के कणबीनी बे हजारथी वधारे चूकववानी शक्ति नथी. छतां वाणियाए कह्युं के पूरा पांच हजारथी एक पाई ओछी लेवी नथी. कणबीए कह्युं के एक हजारथी वधारे एक पाई देवी नथी. वाणियाने तो खबर हती के कणबी पेटी-पटारा, घरवखरी वेचे तोपण बे हजारथी वधारे ते आपी शके तेम नथी. छेवटे रकझक करीने आघुं-पाछुं करतां करतां बंनेय बे हजारमां पताववा तैयार थई गया. आवुं आमां कांई हशे? के थोडुं निश्चयवाळा ढीलुं मूके, थोडुं व्यवहारवाळा ढीलुं मूके तो बन्ने एक थई जाय. अरे भाई! अहीं वस्तुनुं स्वरूप ज आवुं छे त्यां छूटछाटने अवकाश ज कयां छे?

अहीं तो स्पष्ट वात छे के निश्चयथी थाय अने व्यवहारथी न थाय एनुं नाम अनेकान्त छे. व्यवहारथी पण थाय अने निश्चयथी पण थाय ए तो मिथ्या एकान्त छे. स्वभावथी ज थाय, विभावथी न थाय ए सम्यक् एकान्त छे. सम्यक् एकान्त थया विना वास्तविक अनेकान्तनुं ज्ञान साचुं होई शके नहि. श्रीमदे पण ए ज कह्युं छे.

वस्तु अखंड एक ध्रुव चैतन्यबिंब छे. एमां ढळ्‌या विना सम्यक् एकान्त थतुं नथी. ज्यां सम्यक् एकान्त थयुं के ज्ञानमां त्रिकाळी ध्रुव जणायो अने पर्यायमां जे अल्पज्ञता अने रागनी मंदता छे ते पण जणायां. आनुं नाम सम्यक् अनेकान्त छे. रागनी मंदता अने अल्पज्ञतानी पर्यायनुं ज्ञान रहे छे, पण ते हुं छुं एवी मान्यता छूटी जाय छे.

अहीं कहे छे के देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धानो विकल्प, पंचमहाव्रतना परिणाम अने शास्त्र-भणतरनो विकल्प-ए पुण्यभाव विरुद्ध स्वभाववाळा होवाथी जीव ज नथी. लाख ते पीपळनुं झाड नथी अने झाड छे ते लाख नथी तेम पुण्य-पापना भाव ते आत्मा नथी अने आत्मा छे ते पुण्य-पापना भाव नथी. अहाहा...! जीवमांथी जे नीकळी जाय ते जीव नथी. भाई! चार गतिना अपार दुःखना अंत लाववानो आ मार्ग बराबर समजवो जोईए.

लाठीमां घणा वखत पहेलां एक जुवान छोकरीने शीतळा नीकळ्‌या. नानी उंमर, बे वर्षनुं परणेतर. दाणे दाणे ईयळ पडेली. बाई बिचारी घडीक आम पडखुं फेरवे तो घडीक आम फेरवे. पवन नाखे तो गोठे नहि, पाणी पीवुं गोठे नहि. वेदना, वेदना, वेदना; जोयुं न जाय. अढार सालनी उंमर; बिचारी बोली-बा, में आवां पाप आ भवे कर्यां नथी, शुं थयुं आ? कयांय सुख नहि, चैन नहि. बिचारी रोवे, रोवे, आक्रंद करे. जोवाय नहि एवुं दुःख. अरे! एवी तीव्र वेदनामां देह छूटी गयो. आवां अनंत दुःख आ जीवे भोगव्यां तेनाथी छूटवाना उपायनी आ वात छे. खरेखर तो शरीर मारुं मान्युं छे ए ऊंधी मान्यतानुं दुःख छे. संयोगनुं एने दुःख नथी. शरीरने अने रोगने तो आत्मा अडतोय नथी. परंतु शरीर मारुं छे, मने रोग थयो छे एवी विपरीत मान्यता एने आकुळता अने दुःख उत्पन्न करे छे.