समयसार गाथा-७४ ] [ ७७
भाई! तारा दुःखनो कांई पार नथी. शुं कहीए! बापु! तुं मफतना मूळामां अनंतवार वेचायो छे. पहेलां शाकवाळा शाक साथे छोकराने मफतमां मूळो आपता. ए मूळामां तुं अनंतवार जन्म-मरण करी चूकयो छे. पण बधुं भूली गयो छे. अहीं याद करावीने कहे छे के- प्रभु! तुं तारा भगवानने संभाळ. चैतन्यमूर्ति प्रभु आनंदरसनो कंद भगवान आत्मा छे. तेनो आश्रय करीने आस्रव-दुःखने टाळ. आस्रव तारुं स्वरूप नथी. ए तो पर्यायमां तारी शान्तिनो घात करनार छे. जे घात करनार छे तने मदद करनार थाय एम कदीय बनी शके नहि. भाई! तुं गोटाळामां-गूंचवणमां न पड.
शरीरमां जेम क्षयनो रोग थाय तो बिचारो दुःखी दुःखी थई जाय. हाय, क्षयनो रोग थयो! बहु दुःखथी पीडाय. अहीं कहे छे के विकार मारो छे, पुण्य-पापना शुभाशुभ भाव मारा छे एम माने तेने मोटो क्षय लागु पडयो छे. पुण्य-पाप घातक छे, कह्युं ने? जेम लाखना निमित्तथी वृक्षनो क्षय थाय छे तेम पुण्य-पापथी आत्मानी निर्मळ अवस्थानो क्षय थाय छे. जेम लाख वृक्षनुं स्वरूप नथी, मात्र वृक्ष साथे निबद्ध ज छे तेम पुण्य-पापना भाव आत्मानुं स्वरूप नथी, मात्र जीव साथे निबद्ध ज छे अने तेनी शान्तिना घातक छे.
आमां वळी बचाव करीने कोई कहे के व्यवहार आवे छे तो तेनाथी आगळ (मार्गमां) वधाय छे तो ते वात बराबर नथी. भाई! आ वीतरागनो मार्ग तो जेम छे तेम रहेशे, तेमां फेरफार नहि थाय. बापु! तुं आ मार्गनो विरोध न कर. भगवान! आत्मा ज्ञानदर्शनथी परिपूर्ण प्रभु छे. तेनी पर्यायमां पुण्य-पापना भाव थाय ते विरुद्ध-स्वभावे होवाथी घातक छे. ते भावो तारी शान्तिने बाळनारा छे. आस्रवो घातक छे अने आत्मा वध्य छे. आ द्रव्यनी वात नथी, पर्यायनी वात छे. द्रव्य तो जेवुं छे तेवुं अनादि-अनंत चिद्घन छे. पर्यायमां वध्य थवानी लायकात छे, द्रव्यनो वध्य-स्वभाव नथी. एकेन्द्रियथी मांडी पंचेन्द्रिय सुधीनी गमे ते पर्याय हो, वस्तु जे अनंतगुणमां वसेलुं चिदानंदघन तत्त्व छे ए तो एवी ने एवी त्रिकाळ पडी छे.
प्रवचनसार गाथा र०० नी टीकामां आवे छे के-‘जे अनादि संसारथी ज्ञायक- भावपणे ज रह्यो छे अने जे मोह वडे अन्यथा अध्यवसित थाय छे (बीजी रीते जणाय छे) ते शुद्ध आत्माने, आ हुं मोहने उखाडी नाखीने, अति निष्कंप रहेतो थको, यथास्थित ज (जेवो छे तेवो ज) प्राप्त करुं छुं.’ वस्तु तो ज्ञायकभावे त्रिकाळ छे. हुं रागवाळो, पुण्यवाळो इत्यादि मान्यता तो ऊभी करेली छे. पुण्यथी मने लाभ थशे ए तो मोह वडे अन्यथा मान्युं छे; वस्तु एम नथी.
कोई पांच-पचास लाख रूपियानुं दान आपे तो लोको तेने चढावी मारे, मोटो धर्मधुरंधर कहे; परंतु भाई! दान आपवाना भाव तो शुभ छे, पुण्य-बंधनुं कारण छे.