Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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७८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ राग मंद करीने आपे तो पुण्य छे, अने जो वाह-वाह कराववा मानार्थे आपे तो पाप छे. एनाथी धर्म थाय ए वात तो त्रण काळमां नथी. दान आपतां राग मंद करे तोपण हुं राग मंद करुं छुं एम कर्तापणुं माने तो ते मिथ्यात्व छे अने हुं पैसा आपुं छुं एम माने तो ते जडनो स्वामी थाय छे. वीतरागनो मार्ग लोकोए मान्यो छे एनाथी जुदो छे, भाई!

अहीं कहे छे के आवा पुण्यना भाव जे छे ते घातक छे अने आत्मा (पर्यायमां) वध्य छे. परनी दया पाळवानो भाव आस्रव छे अने ते घातक छे. गाथा ७२मां तेने जड अचेतन कहेलो छे. तेमां आवे छे के राग छे ते नथी जाणतो पोताने, नथी जाणतो परने; अन्य चैतन्य द्वारा ते जणाय छे. माटे एमां चैतन्यपणानो अभाव होवाथी ते अचेतन छे. अहीं तेने घातक कह्यो छे. भाई! पुण्यना भावनी जगतने खूब मीठाश छे. ए मीठाश ज एने मारी नाखे छे. पुण्यना फळमां आबरू मळे, धन-संपत्ति मळे. अज्ञानी तेथी राजी-राजी थई जाय छे. पण अहीं कहे छे के पुण्यभावनी जे तने मीठाश छे ते घातक छे. भाई! तेने तुं साधक माने छे पण ते साधक केवी रीते होय?

प्रश्नः- पंचास्तिकायमां व्यवहार साधक अने निश्चय साध्य एम कह्युं छे ने?

उत्तरः– भाई! ए तो आरोप करीने कथन कर्युं छे. रागथी भिन्न पडीने चैतन्यस्वरूपना अनुभवथी साधक थाय त्यारे ते भूमिकानो जे मंद राग छे तेने आरोप करीने साधक कह्यो छे. ए ज्ञान कराववा एने व्यवहारथी साधक कहेवाय छे. धर्म कांई बे प्रकारे नथी, धर्मनुं निरूपण बे प्रकारे छे. चैतन्यस्वभावना आश्रये थयेली जे निर्मळ दशा ते धर्म छे अने ते काळे रागने सहचर देखीने आरोप आपी तेने व्यवहारथी साधक कहेवामां आवे छे. खरेखर तो आस्रवो विरुद्ध स्वभाववाळा होवाथी तेओ जीव ज नथी. पुण्यनो भाव-दया, दान, व्रत, भक्ति इत्यादिना भाव आस्रवो होवाथी जीव ज नथी एम अहीं कहे छे.

व्यवहाररत्नत्रयनो राग छे तो घातक, पंचास्तिकायमां तेने साधक कह्यो छे ए तो ज्ञानीना (आ) रागमां आरोप करीने व्यवहारथी तेने साधक कह्यो छे. परंतु जेने आत्मज्ञान नथी ते तो व्यवहारमां मूढ छे. तेना शुभरागने व्यवहार कहेवामां आवतो नथी.

समयसार गाथा ४१३मां आवे छे-‘जेओ द्रव्यलिंगमां ममकार वडे अहंकार करे छे, तेओ अनादिरूढ व्यवहारमां मूढ वर्तता थका, प्रौढ विवेकवाळा निश्चय पर अनारूढ वर्तता थका परमार्थसत्य भगवान समयसारने देखता-अनुभवता नथी.’ अहीं त्रण बोल कह्या छे.

रागनी मंदतानुं आचरण अनादिथी छे. निगोद अवस्थामां पण जीवने पुण्य-