समयसार गाथा ७४ ] [ ७९ परिणाम थाय छे, छतां ते व्यवहार नथी. जेणे निज आत्मानुं ज्ञान-श्रद्धान प्रगट कर्युं नथी तेने एकलो पराश्रित भाव छे. ते मूढ जेवो छे. तेने व्यवहारमूढ केम कह्यो? तो कहे छे के ते एकलो रागनी मंदतानी रुचिमां ज पडयो छे अने स्वाश्रित एवा निश्चयमां ते अनारूढ छे. आ प्रमाणे अनादिरूढ ते व्यवहारमां मूढ छे. हवे ते मूढता त्यागीने व्यवहारनो जाणनारो कयारे थाय? स्वद्रव्यनो-स्वरूपनो आश्रय लईने सम्यक्त्वादि प्रगट करतां ते व्यवहारनो जाणनार रहे छे. भगवान पूर्णानंदनो नाथ त्रिकाळी ध्रुव जे चैतन्यमय वस्तु तेनो आश्रय करतां जेने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र प्रगट थयां ते व्यवहार-विमूढ नथी. तेने व्यवहार छे खरो, पण तेने व्यवहार जाणेलो प्रयोजनवान छे. आम वात छे.
शुभाशुभ बंने भाव आस्रव छे, अने आस्रव छे ते स्वरूपनो घातक छे. निश्चयमां जे आरूढ छे तेने पूर्ण वीतरागता न थाय त्यां सुधी व्यवहार आवे छे अने तेने आरोप आपीने (निश्चयनो उपचार करीने) साधक कहेवामां आवे छे. ज्ञानी तेने यथार्थपणे जाणी ले छे. अज्ञानीना शुभरागने तो आरोपथी पण साधक कही शकातो नथी.
प्रश्नः- व्यवहारने परंपरा मोक्षनुं कारण कह्युं छे ने?
उत्तरः– हा, पण कोनो व्यवहार अने कयो व्यवहार? जेने अंतरमां आत्मदर्शन थयुं छे, स्वाश्रयथी-निज चैतन्यना आश्रयथी सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी शुद्ध परिणति प्रगट थई छे जे खरेखर आगळ जतां मोक्षनो साधक छे, तेने जे राग (व्यवहार) बाकी छे ते रागपरिणाममां उपचार करीने तेने व्यवहारथी परंपरा कारण कहेल छे; केमके एना शुभमां अशुभ टळ्यो छे. ए छे तो बाधक ज-एम समजवुं. नियमसार गाथा २ नी टीकामां आवे छे के-निज परमात्मतत्त्वनां सम्यक्श्रद्धान-ज्ञान-अनुष्ठानरूप शुद्धरत्नत्रयात्मक मार्ग परम निरपेक्ष होवाथी मोक्षनो उपाय छे अने ते शुद्धरत्नत्रयनुं फळ स्वात्मोपलब्धि छे.’ मोक्ष अने मोक्षमार्गने रागनी मंदतानी, भेदनी के परनी कोई अपेक्षा नथी. ए तो परम निरपेक्ष छे.
वळी जेने चैतन्यमूर्ति निर्मळानंदस्वरूप भगवान आत्मानी द्रष्टि ज थई नथी तेना शुभभावमां अशुभ टळ्यो ज नथी, केमके तेने मिथ्यादर्शननुं महा अशुभ तो ऊभुं ज छे. तेनी तो रुचि ज शुभभावमां पडी छे तेथी तेना शुभरागने व्यवहारथी पण साधक कहेता नथी. माटे पर्यायमां जे शुभाशुभ राग थाय छे ते स्वभावना घातक छे अने विरुद्ध स्वभाववाळा होवाथी जीवनिबद्ध छे, तोपण जीव नथी एम निश्चय करवो. आ एक बोल थयो.
हवे बीजो बोलः-- ‘आस्रवो वाईना वेगनी जेम वधता-घटता होवाथी अध्रुव छे; चैतन्यमात्र जीव ज ध्रुव छे.’ जुओ! आस्रवो मृगीना रोगनी जेम वधता-घटता छे.