८० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ शुभभाव वधे वळी घटे, ते ज प्रमाणे अशुभ भाव पण वधे वळी घटे. यौवनावस्थामां अशुभभाव वधे, वळी वृद्धावस्थामां घटे. तेम शुभभाव पण वधे अने घटे. अहा! वध-घटपणुं ए आस्रवोनुं लक्षण छे. जेम कोईने दश लाखनी मूडी होय ते छेल्ले विचार करे के एमांथी पांच लाख शुभमां दानमां आपुं. परंतु दीकराने वात करे त्यां दीकरो पूछे-बापुजी, मारा माटे शुं? एटले बापानो दाननो भाव घटी जाय. आ प्रमाणे वधे अने घटे ए आस्रवोनुं लक्षण छे. तेथी आस्रवो अध्रुव छे, पुण्य-पापना भाव अध्रुव छे. चैतन्यमात्र जीव ज ध्रुव छे. आम बंनेनो भेद जाणीने जे ध्रुवने अवलंब्यो तेने आत्मा विज्ञानघन थाय छे अने ते ज काळे ते आस्रवोथी निवर्ते छे.
शुभाशुभ भाव वधता-घटता थता होवाथी अध्रुव छे. कोई वार संसार उपर वैराग्य थई जाय अने संसारनो राग मोळो पडी जाय. तो वळी कांईक बाह्य अनुकूळता वधे अने बहार मान, मोटप मळवा मांडे तो पाछो राग वधी जाय. आ प्रमाणे आस्रवो अध्रुव छे अने चैतन्यमात्र वस्तु आत्मा एक ध्रुव, ध्रुव छे. अहाहा...! जेमां राग नहि, पर्याय नहि, भेद नहि एवो अखंड एकरूप चैतन्यमात्र आत्मा ज ध्रुव छे. आ प्रमाणे अध्रुवथी भिन्न पडीने ध्रुव चैतन्यवस्तुमां एकाग्र थवुं तेनुं नाम धर्म छे. आ बीजो बोल थयो.
त्रीजो बोलः- हवे आ त्रीजो बोल अनित्यनो बोल छे. अध्रुव अने अनित्यमां फेर छे. अध्रुवमां वध-घटपणुं छे अने अनित्यमां एक पछी एक छे. ‘आस्रवो शीतदाह-ज्वरना आवेशनी जेम अनुक्रमे उत्पन्न थता होवाथी अनित्य छे; विज्ञानघन जेनो स्वभाव छे एवो जीव ज नित्य छे.’
अध्रुवमां भावोनी वध-घटनी अपेक्षा छे, अनित्यमां एक पछी एक अनुक्रमनी अपेक्षा छे. अनुक्रम एटले-जेम टाढिया ताव वखते उष्ण ज्वर न होय अने उष्णज्वर वेळा टाढियो ताव न होय तेम शुभभाव वखते अशुभ न होय अने अशुभभाव वखते शुभ न होय. आ प्रमाणे शुभ-अशुभ भावो अनुक्रमे उत्पन्न थता होवाथी अनित्य छे. हिंसाना भाव होय त्यारे दयाना परिणाम न होय अने दयाना परिणाम होय त्यारे हिंसानो भाव न होय. आम अनुक्रमे थता, पलटता रहेता, नाश पामता आस्रवो अनित्य छे. अने विज्ञानघन जेनो स्वभाव छे एवो आत्मा ज नित्य छे. चिदानंदघन-स्वरूप भगवान आत्मा सदा एकरूप होवाथी नित्य छे.
रागभावनो हुं कर्ता अने राग मारुं कर्म एम मानवुं ए मिथ्यात्व छे. ते आस्रव छे, अनित्य परिणाम छे. अने चैतन्यघन नित्यानंद प्रभु आत्मा एनाथी भिन्न नित्य छे. आवा रागथी भिन्न नित्यस्वरूप आत्माने जाणवो-अनुभववो ते भेदज्ञान छे. ज्ञानीने राग आवे पण तेना स्वामीपणे ते परिणमतो नथी. ते रागने अनित्य जाणीने तेमां रहेता नथी पण तेनाथी भेद पाडीने ज्ञानमां रहे छे.