समयसार गाथा ७४ ] [ ८१
‘विज्ञानघन जेनो स्वभाव छे एवो जीव ज नित्य छे.’ जुओ, ‘ज’ कहीने एकान्त कर्युं छे. कथंचित् नित्य अने कथंचित् अनित्य छे एम नथी कह्युं. नित्य छे ते एकान्त नित्य ज छे, अनित्य छे ते एकान्त अनित्य ज छे. आखा समग्र द्रव्यनी व्याख्या करवी होय तो त्यां कथंचित् नित्य कथंचित् अनित्य छे एम कहेवाय. पण द्रव्यद्रष्टिथी द्रव्य नित्य ज छे अने पर्याय अनित्य ज छे. आस्रवो अनित्य छे अने आत्मा चैतन्यघन नित्य छे. त्यां नित्यानंद चैतन्यघन प्रभु नित्यमां द्रष्टि लगाडवाथी भेदज्ञान थतां आस्रवनो हुं कर्ता अने आस्रव मारुं कर्म एवी कर्ता- कर्मप्रवृत्तिनो अभाव थाय छे. आ प्रमाणे आस्रवो-शुभाशुभ बन्नेय घातक, अध्रुव अने अनित्य छे अने भगवान आत्मा वध्य, ध्रुव अने नित्य छे एम त्रण बोल थया. आ बन्ने वच्चे भेदज्ञान करतां आस्रवो छूटी जाय छे. हवे चोथो बोल-
चोथो बोलः- ‘जेम कामसेवनमां वीर्य छूटी जाय ते क्षणे ज दारुण कामनो संस्कार नाश पामी जाय छे, कोईथी रोकी राखी शकातो नथी, तेम कर्मोदय छूटी जाय ते क्षणे ज आस्रवो नाश पामी जाय छे, रोकी राखी शकाता नथी, माटे तेओ अशरण छे; आपोआप (पोताथी ज) रक्षित एवो सहज चित्शक्तिरूप जीव ज शरणसहित छे.’
मुनिवरो वीतरागी संतोए केवो दाखलो आप्यो छे! विषयसेवनमां वीर्य छूटी जाय ते क्षणे ज कामनी वासनाना दारुण संस्कार छूटी जाय छे, कोईथी रोकी शकाता नथी. तेम कर्मोदय छूटी जाय त्यारे आस्रवोनो नाश थाय छे. कर्मना उदयना निमित्ते जे आस्रवो थाय छे ते निमित्त मटी जतां छूटी जाय छे. कोइथी शुभाशुभ परिणामो रोकी राखी शकाता नथी. माटे आस्रवो- पुण्यपापना भावो अशरण छे. जुओ! शुभभाव पण अशरण छे. दया, दान, व्रत आदिना शुभभाव अशरण छे, कारण के उदयनुं खरी जवुं कोईथी रोकी शकातुं नथी. आपोआप-पोताथी ज रक्षित एवो सहज चित्शक्तिरूप जीव ज शरणसहित छे. अहाहा...! भगवान आत्मा आपोआप पोताथी ज रक्षित छे. एने राखवो पडे एवुं कयां छे? ए तो रक्षित ज छे. श्रीमद्मां आवे छे के-
स्वद्रव्यना रक्षक त्वराथी थाओ.
स्वद्रव्यना व्यापक त्वराथी थाओ.
स्वद्रव्यना धारक त्वराथी थाओ.
स्वद्रव्यना रक्षक त्वराथी थाओ.
स्वद्रव्यना ग्राहक त्वराथी थाओ.
स्वद्रव्यनी रक्षक्ता उपर लक्ष राखो.
परद्रव्यनी धारक्ता त्वराथी तजो.