Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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८२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

परद्रव्यनी रमणता त्वराथी तजो.
परद्रव्यनी ग्राहक्ता त्वराथी तजो.
परभावथी विरक्त था.

अहीं कहे छे के आनंदनो नाथ पूर्णानंद प्रभु आपोआप ज रक्षित छे. तेनी द्रष्टि थाय त्यारे ते रक्षित छे एम जणाय छे. अहाहा...! नित्यानंद प्रभु पोते अनादि-अनंत स्वयं रक्षायेलो छे तेनी द्रष्टि करे त्यारे पर्यायमां पोते रक्षित छे एनुं भान थाय छे अने त्यारे आत्मा शरणरूप थतां अशरण एवा आस्रवोथी पोते निवर्ते छे. भाई! आवा शुद्ध ज्ञायकद्रव्यनी द्रष्टि थया विना एकलुं बाह्य आचरण-व्रत, नियम, संयम इत्यादि थोथे थोथां छे.

माणसोने लागे के-अरे! बायडी छोडी, घर छोडयुं, दुकान छोडी, बधुं छोडयुं. तो य कांई नहि? हा भाई! कांई नहि. ए तो बधी बाह्य चीजो छे, अने अंदरमां ते वखते जे राग छे ते शुभभाव छे. ते कांई धर्म नथी. भाई! दया, दान, व्रत इत्यादि परिणाम ते परद्रव्यना परिणाम छे, राग छे. ते अध्रुव, अनित्य अने अशरण छे एम अहीं कह्युं छे. पुरुषार्थसिद्धयुपायमां रागनी उत्पत्तिने हिंसा कही छे अने रागनी अनुत्पत्ति ते अहिंसा छे एम कह्युं छे. अहाहा...! भगवान आत्मा शुद्ध चैतन्यघन पूर्णानंदनो नाथ जे प्रभु छे तेनो आश्रय लेतां जे निर्मळ वीतरागी पर्याय उत्पन्न थाय ते अहिंसा छे, ते शरण छे, धर्म छे. चार बोल थया.

हवे पांचमो बोलः- ‘आस्रवो सदाय आकुळ स्वभाववाळा होवाथी दुःखरूप छे; सदाय निराकुळ स्वभाववाळो जीव ज अदुःखरूप अर्थात् सुखरूप छे.’

गाथा ४पनी टीकामां कह्युं छे के-‘अध्यवसान आदि समस्त भावोने उत्पन्न करनारुं जे आठे प्रकारनुं ज्ञानावरणादि कर्म छे ते बधुंय पुद्गलमय छे एवुं सर्वज्ञनुं वचन छे. विपाकनी हदे पहोंचेला ते कर्मना फळपणे जे कहेवामां आवे छे ते, अनाकुळतालक्षण जे सुख नामनो आत्मस्वभाव तेनाथी विलक्षण होवाथी, दुःख छे. ते दुःखमां ज आकुळता-लक्षण अध्यवसान आदि भावो समावेश पामे छे; तेथी, जोके तेओ चैतन्य साथे संबंध होवानो भ्रम उपजावे छे तोपण, तेओ आत्माना स्वभावो नथी पण पुद्गलस्वभावो छे.’

आम आस्रवो सदाय आकुळ स्वभाववाळा होवाथी दुःखरूप छे. दया, दान, व्रत, भक्ति इत्यादि भावो दुःखरूप छे. अहा! जे दुःखरूप छे ते सुखनुं साधन केम थई शके? शुभरागने साधन कहेवुं ए तो निमित्तनुं ज्ञान करावनारुं उपचार कथन छे; खरेखर ते साधन छे एम नथी. जेम उपादाननी पर्याय पोताथी थाय छे, निमित्तथी नहि-जेम घडानी पर्यायनो कर्ता कुंभार नथी-तेम विकारी पर्यायनो कर्ता पर नथी. अने जे निर्विकारी पर्याय थई तेनुं साधन (शुभराग) विकारी पर्याय नथी. जेम घडो