समयसार गाथा ७४ ] [ ८३ पोताथी ज थयो छे तेम निर्मळ अवस्था पोताथी ज थई छे, रागनी मंदता छे माटे थई छे एम नथी. भाई! वस्तुनुं स्वरूप ज आवुं छे त्यां शुं थाय?
कहे छे के भगवान आत्मा सदा निराकुळ स्वभाववाळो होवाथी सुखरूप छे. अहाहा...! चैतन्यघन वस्तु सदा सुखरूप छे. अरे! सुख माटे झावां नाखनारने सुख कयां छे एनी खबर नथी! बिचारो पैसामां, आबरूमां, मकानमां, भोगमां, पुण्यमां इत्यादिमां सुख शोध्या करे पण कयांथी मळे? ज्यां छे नहि त्यां कयांथी मळे? पुण्य अने पापना भाव तो दुःखरूप छे. अने एना फळमां प्राप्त बाह्य सामग्री पण दुःखमां निमित्त छे. आ पुण्यना फळमां चक्रवर्ती आदि पद मळे तोपण ए तो एक बाह्य चीज छे, तेना तरफनो जे राग छे ते दुःखरूप छे. भगवान आत्मा एक ज सुखस्वरूप छे. तेथी जेने सुख जोईतुं होय तेणे निज चैतन्यस्वभावी आत्मामां ज शोधवुं पडशे. त्यांथी सुख मळशे. परंतु पुण्य-पापना भावमांथी के संयोगी पदार्थोमांथी कदीय सुख नहि मळे.
भगवान आत्मा सदाय निराकुळ आनंदस्वरूप छे. ते स्वरूपना आश्रये सम्यग्दर्शन- ज्ञान-चारित्ररूप जे धर्म प्रगटे ते सुखरूप दशा छे. परंतु बाह्य व्यवहार जे दुःखरूप छे तेना आश्रये सुख प्रगट न थाय. भाई! आ वीतरागनो मार्ग लोको माने छे एनाथी बहु जुदो छे. चैतन्य स्वभावना आश्रये जे निर्मळ पर्याय प्रगट थाय ते आत्मव्यवहार छे. जे रागभाव छे ते आत्मव्यवहार नथी, ए तो मनुष्यव्यवहार छे, संसारीनो व्यवहार छे. प्रवचनसार गाथा ९४ नी टीकामां कह्युं छे के-अविचलित-चेतनाविलासमात्र आत्म-व्यवहार छे अने जेमां समस्त क्रियाकलापने भेटवामां आवे छे ते मनुष्यव्यवहार छे. अहाहा! शुद्ध आत्मद्रव्यना आश्रये उत्पन्न निर्मळ विशुद्धि ते आत्मव्यवहार छे अने ते सुखदशा छे. बाह्य व्यवहार जे दुःखरूप छे ते कारण अने आनंद प्रगटे ते कार्य एम कदीय होई शके नहि. आनंदमूर्ति जे त्रिकाळी भगवान अंदर पडयो छे तेने कारणपणे ग्रहतां (तेनो आश्रय करतां) आनंद प्रगटे छे.
भाई! जन्म-मरणना अंत लाववा होय एने तो आ समजवुं पडशे. मुंबईना दरियाना पाणी उपर बगला उडता उडता घणे दूर सुधी जाय छे. कोईने पूछयुं के आ केटले दूर जतां हशे? तो कहे के वीस वीस माईल सुधी माछला पकडवा चाल्या जाय छे. जुओ! आ परिणाम! एना फळमां अहींथी छूटी नरकमां चाल्या जशे. दुःखना स्थानमां अवतार थशे. माटे भाई! हमणां ज चेत. परिभ्रमण ज न रहे एवा भावने प्रगट कर. अहाहा...! जेमां परिभ्रमण नहि अने परिभ्रमणनो भाव पण नहि एवा नित्यानंदस्वरूपनी समीप जा; तने परिभ्रमण मटशे. पर्यायमां आ जे राग छे ते दुःखरूप छे. एनाथी खसी अनाकुळस्वभावी त्रिकाळी आनंदना नाथ पासे जा; तने आनंद थशे, सुख थशे, शान्तिनी धारा प्रगटशे, तृप्ति थशे. जो ने! पांचमी गाथामां आचार्य भगवान स्वयं