८४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ कहे छे के अमारा स्वानुभवमां प्रचुर आनंदनी मुद्रा छे, आनंदनी छाप छे. स्वभावना आश्रये प्रगट थयेलो अनुभव अनाकुळ आनंदनी महोर सहित होय छे.
सदाय निराकुळ स्वभाववाळो होवाथी जीव ज सुखरूप छे. त्यारे कोई कहे आ तो एकांत थई गयुं. कथंचित् सुखरूप अने कथंचित् दुःखरूप-एम कहो ने? भाई! ए अनेकान्तनुं स्वरूप नथी. आत्मा एकान्त सुखरूप छे अने दुःखरूप बीलकुल नथी एनुं नाम अनेकान्त छे. भाई! सुखना पंथे चढवुं होय तो संयोग अने संयोगीभावथी खसी जा अने एकान्त सुखस्वरूप आत्मामां निमग्न थई जा. अहाहा...! अनाकुळ आनंदस्वरूप भगवान आत्मामां ज्यां एकाग्र थयो के तरत ज दुःखनो अभाव थई सुख प्रगट थाय छे. जे काळे सुख प्राप्त थाय छे ते ज काळे दुःखनो अभाव थाय छे अने जे काळे दुःखनो अभाव थाय छे ते ज काळे सुखनी प्राप्ति थाय छे. आ प्रमाणे दुःखनी निवृत्ति अने सुखनी प्राप्तिनो समकाळ छे.
त्यां वळी कोई कहे छे के चारित्र तो खांडानी धार पर चालवा जेवुं अने मीणना दांत लोढाना चणा चाववा जेवुं कठण (कष्टसाध्य) छे. भाई! तुं शुं कहे छे? तने चारित्रना स्वरूपनी खबर नथी. चारित्र तो दुःखना अभावरूप अति सुखदायक आत्मानो परिणाम छे. कष्टसाध्य छे एम शास्त्रमां आवे छे त्यां कष्टनो अर्थ तो पुरुषार्थ थाय छे. अंतरनो उग्र पुरुषार्थ करीने स्वभावमां ढळी जा एम त्यां आशय छे. महा कष्टे एटले महा पुरुषार्थ करीने पण शाताशीळियापणुं (प्रमाद) छोडी दे अने आत्म-रमणतारूप आनंददायी चारित्र साधी ले-आम प्रबळ पुरुषार्थनी प्रेरणानी एमां वात छे, पण चारित्र कष्टदायी छे एम वात नथी. जुओ पांच बोल आवी गया.
१. पुण्य-पापना भाव घातक छे अने आत्मा (पर्याय) वध्य-घात थवा योग्य छे. २. पुण्य-पापना भाव वधता-घटता छे तेथी अध्रुव छे, अने भगवान आत्मा ध्रुव छे.
३. पुण्य-पापना भाव अनुक्रमे उत्पन्न थाय छे माटे अनित्य छे, अने भगवान आत्मा एकरूप नित्य छे.
४. रागादिभाव निमित्तना लक्षे थाय छे तेथी अशरण छे, अने आनंदघन प्रभु आत्मा शरण छे.
प. शुभाशुभ भाव दुःखरूप छे, अने भगवान आत्मा सहज सुखस्वरूप छे, हवे छठ्ठो बोल-
‘आस्रवो आगामी काळमां आकुळताने उत्पन्न करनारा एवा पुद्गलपरिणामना हेतु होवाथी दुःखफळरूप छे.’ आ पुण्य-पापना भावो आगामी काळमां आकुळता उपजावनारा छे. एटले शुं? के आ पुण्यना भावथी जे पुण्य बंधायुं तेना फळरूपे