८६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
उत्तरः– तीर्थंकरनामकर्मनो जे बंध छे ते जीव ज्यारे शुभाशुभ भावनो संपूर्ण नाश करी पूर्ण वीतरागता अने केवळज्ञान उपजावशे त्यारे उदयमां आवे छे. (माटे त्यां ए प्रश्न ज नथी.) प्रश्नः– पुण्यानुबंधी पुण्य बंधाय एवा परिणाम सुखरूप छे के नहि? उत्तरः– गमे ते पुण्यना परिणाम हो, वर्तमानमां ते दुःखरूप छे अने भविष्यमां पण दुःखना कारणरूप छे. पुण्यानुबंधी पुण्य पण भाविमां आकुळता थवामां निमित्त छे, परंतु आत्मानी शांति-समाधिनुं निमित्त नथी. प्रश्नः- पुण्यना फळमां लक्ष्मी-संपत्ति आदि मळे तो ते धर्म करवामां साधन थाय. केम ए बराबर छे ने?
तेना निमित्ते भविष्यमां आबरू, संपत्ति आदि सानुकूळ संयोगो मळे अने ते संयोगोना लक्षे राग ज थाय, दुःख ज थाय. ते संयोगो कांई आत्मानी शान्ति-समाधिनां निमित्त नथी. परवस्तु कांई धर्मनुं साधन नथी. संयोगो प्रत्येनो राग मटाडी, तेनाथी निवृत्त थई अंदर आत्मामां-शुद्ध चिदानंदघन वस्तुमां प्रवृत्त थाय त्यारे धर्म थाय छे. भाई! वीतरागनो मार्ग लोको माने छे तेनाथी जुदो छे. अहो! दिगंबर संतोनी शैलि गजब छे! सत्यने सिद्ध करवानी शुं अलौकिक शैली छे! व्यवहार छे, पण ते शुभराग कांई धर्मनुं साधन नथी. परमात्मप्रकाशमां आवे छे के निश्चयनुं नाम वीतराग छे, व्यवहारनुं नाम सराग छे. सरागने निश्चयनुं-वीतरागनुं साधन कहेवुं ए उपचार छे, आरोपित कथन छे. अहीं तो स्पष्ट कहे छे के वर्तमान सरागता छे ते भविष्यमां दुःखनुं कारण एवा पुद्गलपरिणामनो हेतु छे. व्यवहाररत्नत्रयना परिणामने साधक कह्यो छे ए तो उपचारथी कथन कर्युं छे. निमित्तनुं ज्ञान कराववा तेने साधक कह्यो छे, पण साधक बे प्रकारना छे एम नथी. साधकनुं निरूपण बे प्रकारे छे. जेम मोक्षमार्ग बे प्रकारनो नथी, तेनुं निरूपण बे प्रकारथी छे तेम साधक बे प्रकारना नथी पण तेनुं निरूपण बे प्रकारथी छे. शुभरागने व्यवहारथी साधकनो आरोप आप्यो छे, खरेखर ते साधक छे नहि. जेम समकितीने निश्चय सम्यग्दर्शन छे तेनी साथे देव-गुरु-शास्त्रनी श्रद्धानो जे राग छे तेने व्यवहार समकित कह्युं. पण ए व्यवहार समकित कांई समकितनी- श्रद्धाननी पर्याय नथी. ए तो रागनी पर्याय छे. पण निश्चयनो सहचर देखी, निमित्त गणीने, उपचार करीने तेने समकित कहेवामां आवेल छे. मोक्षमार्ग प्रकाशकमां लख्युं छे के सर्वत्र निश्चय-व्यवहारनुं लक्षण आ रीते जाणवुं. व्यवहार करतां करतां मोक्ष थशे एवा एकला (मिथ्या)